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Home समीक्षा

आखेटक समय का प्रतिपक्ष (ज्योति कुमारी के कहानी संग्रह पर राकेश बिहारी)

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in समीक्षा, साहित्य
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‘एक जीवन अलग से’ पर पल्लवी विनोद की समीक्षा

आखेटक समय का प्रतिपक्ष
 – राकेश बिहारी
(हंस, मार्च, 2013)

 पुस्तक   : दस्तख़त तथा अन्य कहानियां (कहानी-संग्रह)
लेखिका  : ज्योति कुमारी
प्रकाशन : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य      : 250 रुपये
 ————————————————————————
युवा कथाकार ज्योति कुमारी का पहला कहानी-संग्रह ‘दस्तखत तथा अन्य कहानियां’ अपने प्रकाशन के साथ ही कतिपय साहित्येतर कारणों से चर्चा में है. अखबारों की मानें तो पहले यह किताब किसी अन्य प्रकाशन गृह से छपकर आनेवाली थी. इस पुस्तक के प्रकाशन से जुड़ी इस अवांतार कथा का उल्लेख यहां इसलिये जरूरी है कि, ज्योति कुमारी अपने जीवन में जिस तरह का प्रतिरोध दर्ज कराती हैं, ठीक उसी प्रतिरोधी तेवर की कथा-नायिकायें इस संग्रह की लगभग हर कहानी में मौजूद है. समाज के बने बनाये मानदंडों का अतिक्रमण कर अपने मन का जीने और करने की सहज मानवीय जिजीविषाओं से भरी ये कथा-नायिकायें शर्म और वर्जना की तमाम चौहद्दियों को लांघकर स्त्री जीवन के उन अनुभवों को खोलती-खंगालती चलती हैं, जिधर जाने का साहस बहुत कम लेखक-लेखिकायें कर पाते हैं. दुस्साहसी होने के हद तक का साहस दिखातीं ये युवा स्त्रियां अपनी आकांक्षाओं और सपनों का आकाश पाने के लिये जिस मानसिक अंतर्द्वन्द्व, पीड़ा और आक्रोश से गुजरती हैं, वही इस संग्रह में कहानियों की शक्ल में मौजूद है.
किसी कहानी को उसके लेखक की आत्मकथा कहा जाना भले ही एक खास तरह का सरलीकरण हो, लेकिन जब तक लेखक अपनी कहानी में खुद उपस्थित न हो, या परकाया प्रवेश की सघन लेखकीय क्षमता से पाठकों के भीतर स्वयं की कहानी होने का अहसास न पैदा कर दे, कोई भी कहानी अपना असर नहीं छोड़ती. इस दृष्टि से देखें तो इस संग्रह की अधिकांश कहानियां यथा – ‘शरीफ लड़की’, ‘टिकने की जगह’, ‘नाना की गुड़िया’, ‘होड़’, ‘विकलांग श्रद्धा’ आदि सफल और असरदार कहानियां हैं. ज्योति कुमारी की कहानियों की नायिकायें अक्सर शादी-शुदा लेकिन अपने मन का जीवन न जी पाने की कचोट से तिलमिलाई और प्रतिरोध को आतुर एक ऐसी तरुण या युवा स्त्री होती है, जिसके भीतर समाज के दकियानूसी और दोहरे मानदंडों के खिलाफ गुस्से का लावा अपने सातवें आसमान पर होता है. वह अपने गुस्से का इजहार करती है, अकेले होने का जोखिम उठाते हुये अपने दम पर अपने मन का संसार सिरजने का जतन भी करती है लेकिन इस क्रम में कई बार उसकी धुंधली दृष्टि, पितृसत्ता के नाम पर पुरुष मात्र को नकारने की अतिउत्साही और रुमानी जिद आदि तमाम प्रतिरोधों के बावजूद अपने अंतर्विरोधों के कारण उसे उसी व्यवस्था के पोषक के रूप में ला खड़ा करती है, जिसका उसे प्रतिपक्ष बनना था. प्रतिरोध और अंतर्विरोध के इन्हीं दो छोरों के बीच फैले ज्योति कुमारी के कथा-संसार को समझने के लिये संग्रह की कहानी ‘दो औरतें’ की कुछ पंक्तियां – “हां, एक बात और सुन लीजिये वकील साहब…मैं उसे भूल नहीं सकती. यह बात उसे भी बता दीजियेगा. मैं बहुत चाहती हूं उसे. आश्रम में रहकर भी उसकी कामयाबी और सदबुद्धि के लिये ही प्रार्थना करूंगी. उसका परलोक न बिगड़े इसके लिये प्रार्थना करूंगी. उसने मुझे जो प्यार दिया है, वही तो अनमोल थाती है मेरी.. इसलिये वह कितना भी पापी हो जाये, लेकिन है तो मेरा पति ही… मेरा सबकुछ… उसका सबकुछ यूं ही फलता-फूलता रहे, उसके लिये मुझे यह प्रायश्चित करना ही होगा. हां उसे यह भी कहियेगा कि उससे छुटकारा लेकर भी मैं उसी की रहूंगी और भगवान से प्रार्थना करूंगी कि  अगले जन्म में उसे सदबुद्धि मिले और वह उस जन्म में भी मेरा पति ही बने.” प्रतिरोध के समानांतर अंतर्विरोध की यह धारा किसी न किसी रूप में संग्रह की कई कहानियों में मौजूद है. कहने की जरूरत नहीं कि महिला कथाकारों की कहानियां कई अर्थों में इन्हीं अन्तर्विरोधों से उबरने की संघर्षपूर्ण उपलब्धियां रही हैं. उल्लेखनीय है कि न सिर्फ पूर्ववर्ती बल्कि समकालीन स्त्री कथाकारों की कहानियां इन अन्तर्विरोधों से जूझ कर बहुत आगे निकल चुकी हैं. ज्योति के जीवनानुभवों की यह रचनात्मक पुनर्यात्रा अपने प्रतिरोध और प्रतिकार से एक वैकल्पिक समाज का निर्माण कर सके इसके लिये उनका इन अंतर्विरोधों से मुक्त होना बहुत जरूरी है.
संग्रह की दो कहानियां – ‘टिकने की जगह’ और ‘होड़’ सर्वथा भिन्न आस्वाद की कहानियां हैं. इनमें से पहली कहानी जहां, हमारी दैनंदिनी में जड़ जमा चुकी सांप्रदायिकता के सूक्ष्म कारणों को उजागर करती है वहीं दूसरी कहानी उपभोक्तावाद के प्रसार और प्रभाव के कारण हमारे जीवन-व्यवहारों में घुस आये दिखावे और स्पर्धा के मनोविज्ञान से उत्पन्न स्थितियों से पर्दा उठाती है. पिछले दिनों सांप्रदायिकता को लेकर लिखी गई अधिकांश चर्चित कहानियां हिन्दू लड़के और मुस्लिम लड़की के प्रेम तथा दंगे के फार्मूले से गढ़ी गई हैं. ‘टिकने की जगह’ में ज्योति कुमारी न सिर्फ उन फार्मूलों का अतिक्रमण करती हैं बल्कि हमारे संस्कारगत आचार-व्यवहार में पैठे सांप्रदायिकता के कारणों का खुलासा करते हुये भूख और अर्थाभाव से उसके संबंधों का भी खुलासा करती है. आर्थिक किल्लतें और जरूरतें किस तरह हमारी रूढ़ियों के परिवर्धन के बहाने निजी संबंधों और सामाजिक ढांचे को तहस-नहस करती हैं इसे इस कहानी से आसानी से समझा जा सकता है.
संग्रह की लगभगग सभी कहानियां एक-से विषय संदर्भों को लेकर ही लिखी गई हैं, जिनके केन्द्र में छोटे शहरों की युवा स्त्री का जीवन, उसके ऊहापोह और संघर्ष हैं. एक जैसी लड़कियां, उनकी एक जैसी सामाजिक-पारिवारिक परिस्थितियां, विद्रोह का उनका लगभग एक ही जैसा तरीका, लगभग हर दूसरी कहानी में कथा नायिका का पत्रकारिता या उससे जुड़े किसी पेशे से होना, उनकी भाषा का लगभग एक जैसा मुहावरा इन कहानियों के एक दूसरे का एक्स्टेंशन या अनुकृति होने का भी भान कराते हैं. हालांकि इस एकरसता को तोड़ने के लिये लेखिका ने कुछ कहानियों में शिल्पगत प्रयोग भी किये हैं. यहां संग्रह की कहानी ‘बीच बाज़ार’ का उल्लेख जरूरी है जो कुछ युवा मनोचिकित्सकों की बातचीत की शैली में लिखी गई है. यद्यपि यह कहानी भी मुख्यत: एक स्त्री के मानसिक द्वंद्वों की ही पड़ताल है, लेकिन जिस तरह लेखिका ने इस कहानी को  पुरुष पात्र की तरफ से कहने की कोशिश की है वह, इसे कमजोर कर देता है. पुरुष बन कर कहानी कहने का यह प्रयोग अमूमन लेखिकायें खुद को न पहचान लिये जाने के भय के कारण करती रही हैं. ‘शरीफ लड़की’, ‘नाना की गुड़िया’ और ‘अनझिप आंखें’ जैसी कहानियों में स्त्री होने के ‘फर्स्ट हैंड’ अनुभवों को स्त्री चरित्रों के माध्यम से कह चुकीं ज्योति को इस तरह के शिल्पगत प्रयोगों से ज्यादा नये जीवन क्षेत्रों के अनुसंधान की तरफ ध्यान देना चाहिये.
स्त्री मनोजगत के आसपास लिखी इन कहानियों पर यह टिप्पणी अधूरी होगी यदि इन कहानियों के पुरुष पात्रों की बात न की जाये. स्त्री पात्रों की तरह इन कहानियों के पुरुष पात्र भी लगभग एक जैसे ही हैं. एक तरफ पिता और भाई जैसे वे पुरुष जो अपनी बेटी या बहन की ज़िंदगी की तमाम त्रासदियों को जानते हुये भी बार-बार अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की दुहाई देते हुये बेटी को सबकुछ निभा जाने की नसीहतें देते हैं , तो दूसरी तरफ मर्द की खाल में छुपे वे शिकारी जो हर क्षण स्त्री-गोश्त के लिये घात लगाये बैठे हैं. पितृसतात्मक समाज का यह चेहरा हम वर्षों से देखते आ रहे हैं और यह सच भी है. लेकिन इसके उलट क्या एक सच यह भी नहीं कि आज पुरुषों का जीवन भी बदलाव से गुजर रहा है? स्त्री विमर्श और देह-मुक्ति के वैचारिक जुमलों को येन केन प्रकारेण बिस्तर तक खींच लाने वाले लार टपकाऊ पुरुषों को जिस शिद्दत और बिना लागलपेट के ये कहानियां कदम-दर-कदम पहचानती हैं, कया ही अच्छा होता ये कहानियां इन बदलते पुरुषों को भी पहचानने का जतन करतीं. हां यहां एक बार फिर ‘टिकने की जगह’ के नायक का उल्लेख जरूरी है जो संग्रह के अन्य पुरुष पात्रों का न सिर्फ प्रतिलोम रचता है बल्कि पुरुष के रूप में एक मित्र की परिकल्पना के आधुनिक स्त्रीवादी नज़रिये का मॉडल भी रचता है. 
तमाम अन्तर्विरोधों और एकरूपता के बावज़ूद इन कहानियों की स्त्रियां तथा समय और समाज के बदलावों के समानांतर अपनी अस्मिता और व्यक्तित्व की पहचान के लिये लड़ी जानेवाली उनकी छोटी-बड़ी अकुंठ और वर्जनाहीन लड़ाईयां कहानी और कहानीकारों की भीड़ में ज्योति कुमारी को एक अलग पहचान देती हैं. अपने पहले ही संग्रह में वर्जित प्रदेशों को खंगालने की इनकी कोशिशों ने उनके प्रति उम्मीदे जगाई हैं. जीवन के विविधवर्णी अनुभव क्षेत्रों के सतत संधान से निकली इनकी आगामी कहानियों का हमें इंतज़ार है. 
राकेश बिहारी
जन्म              :         11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)
शिक्षा              :     ए. सी. एम. ए. (कॉस्ट अकाउन्टेंसी), एम. बी. ए. (फाइनान्स)
प्रकाशन          :         प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियां एवं लेख प्रकाशित
            वह सपने बेचता था (कहानी-संग्रह)
केन्द्र में कहानी (आलोचना)
संप्रति              :         एनटीपीसी लि. में कार्यरत
संपर्क               :         एन एच 3 / सी 76
एनटीपीसी विंध्याचल
पो. –  विंध्यनगर
जिला – सिंगरौली
486885 (म. प्र.)
मो.                 :          09425823033
ईमेल              :          biharirakesh@rediffmail.com

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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