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Home कविता

पराग मांदले की कविताएं

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in कविता, साहित्य
A A
5
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पराग मांदले इस समय के एक स्थापित और चर्चित कथाकार हैं। उनकी कहानियां बिल्कुल अलग मिजाज की होने के कारण अलग से ध्यान खींचती हैं। शुरूआत उन्होंने कविता से की थी। उनका फिर से कविताओं की ओर लौटना एक उम्मीद तो जगाता ही है, साथ ही उनके अन्दर की काव्यभूमि से भी हमारा परिचय कराता है। प्रस्तुत है इसबार अनहद पर उनकी ताजा कविताएं। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा, हमेशा की तरह…
                                                                                                                             – अनहद

परिचय कुछ खास नहीं है। कविताओं से शुरुआत हुई थी लेखन की, मगर कहानियों का रास्ता पकड़ लिया। कहानियों की एक किताब – राजा, कोयल और तंदूर – भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हो चुकी हैं। कहानियां यदा-कदा कुछ पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। पत्रकारिता से शुरुआत कर अब केंद्र सरकार की नौकरी बजा रहा हूँ नासिक में। बस।

                                                                                      — पराग मांदले

पेड़

एक

आधी रात के अंधेरे में
डराता है जिस तरह
खिड़की के बाहर खड़ा
डौलदार पेड़,
वैसे नहीं रहूंगा मैं
जीवन में तुम्हारे।

इसका यह अर्थ नहीं है
कि मेरी अनुपस्थिति भरेगी
तुम्हारे अस्तित्व के किसी हिस्से को
गाढ़े काले रंग से।
इसका यह अर्थ भी नहीं है
कि जेठ की तपती दुपहरी में
मिलने वाली शीतल छाया से भी
वंचित रह जाओगे तुम
मेरे न रहने से।

तमाम आशंकाओं के उलट
मौजूद रहूंगा मैं
तुम्हारे आँगन के किसी सूने कोने में
हमेशा
एक उदास खुशी के साथ
फल देने के लिए
तुम्हारे फेंके गए
हर ढेले के बदले में।
।

दो

चाहे कुछ
कहा न हो मैंने उसे
मगर जानता है बहुत कुछ
आँगन में खड़ा
वह आम का पेड़ बड़ा।

झाँकता है अकसर
खिड़की से वह
मेरे कमरे के भीतर,
कहता नहीं कुछ कभी
बस देखा करता है मौन
मेरी आँखों में तैरते मायूसी के आँसू
मेरे चेहरे पर फैली विरह की पीड़ा
बेबसी से काँपते हाथ मेरे
अबोले से थरथराते होंठ
मेरी बेचैन चहलकदमी
और मेरी अंतहीन उदासी

कभी-कभी तो
आँखों के रास्ते झाँककर
भीतर
देख लेता है वह
मेरी आत्मा प्यासी।

कल रात जब
अपने दिल के हरे घरोंदे में सोए
सुनहरी किनार लिए
नीले पंखों वाले परिंदे को
धीमे से जगाकर
कही थी उसने
दास्तां मेरी
तो आधी रात के
काले गाढ़े अंधकार को चीरकर
उड़ गया था वह परिंदा
चीखते हुए
असीम आकाश में।

अब
दसों दिशाओं को है मालूम
मेरी व्यथा

एक बस शायद
तुम्हें ही नहीं है पता।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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Comments 5

  1. Anonymous says:
    14 years ago

    romanchak hai

    Reply
  2. Anonymous says:
    14 years ago

    romanchak hai………………..
    [BUDDHI LAL PAL]

    Reply
  3. Arpita says:
    14 years ago

    तमाम आशंकाओं के उलट
    मौजूद रहूंगा मैं
    तुम्हारे आँगन के किसी सूने कोने में
    हमेशा
    एक उदास खुशी के साथ
    फल देने के लिए
    तुम्हारे फेंके गए
    हर ढेले के बदले में।
    ————-
    अब
    दसों दिशाओं को है मालूम
    मेरी व्यथा

    एक बस शायद
    तुम्हें ही नहीं है पता।

    पराग जी,कहानियों के साथ कवितायें भी लिखिये..हमें इंतज़ार रहेगा आपकी और ताज़ा कविताओं का.

    Reply
  4. Anonymous says:
    14 years ago

    बहुत ही मासूम कविता..बिल्कुल पराग भाई की तरह मासूम,,,

    Reply
  5. Anonymous says:
    14 years ago

    बहुत अच्छी कविता… पराग जी से आग्रह है कि वे कविताएं भी लिखते रहें… मेरी बधाइयां…
    अरूण शीतांश, आरा

    Reply

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अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

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