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Home कविता

संजय राय की कविताएं

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in कविता, साहित्य
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14
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संजय राय की कविताएं इधर कई पत्रिकाओं में आयी हैं। उनकी कविताएं अपनी संक्षिप्तता में एक जादू जैसी हैं जो पाठकों के दिलो-दिमाग पर सीधे असर करती हैं। संजय जलपाईगुड़ी, पं बंगाल के एक विद्यालय में शिक्षक हैं और M.Phil. कर रहे हैं।  किसी भी ब्लॉग पर उनकी कविताएं पहली बार। आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा। 

संजय राय  संपर्क : 093316292490/9883468442

                                                                                                                 -अनहद






प्रेम

प्रेम
आस्मां का विस्तार है
मैं आसमान से
टहनिया तोड़ता हूं

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तुम्हें देखना

बारिश में भींगते हुए
तुम्हें देखना
किसी सुंदर फूल को
खिलते हुए देखना है

आदमी दौड़ रहा है

ट्रेन चल रही है
आदमी दौड़ रहा है

ट्रेन रूकने लगी है
आदमी दौड़ रहा है

ट्रेन रूक गई है
आदमी दौड़ रहा है

एक टुकड़ा शहर

वह जब भी
जाती है बाजार
एक टुकड़ा शहर ले आती है
अपने पर्स में

मेरे भीतर टूटता है
एक गांव
हर बार

वह लड़की

एक

वह शीशा है
उसमें
खनक है
पर वह टूटती नहीं

दो

एक पांव
बढ़ाते ही
वह बाहर हो जाती है घर से
और
एक कदम पीछे हटने पर
कैद हो जाती है
उल छोटे से दमघोंटू कमरे में

उसके घर में
आंगन नहीं है
शायद वह सांस नहीं लेती

तीन

उसने जब भी
कोई सपना देखा
एक चिडिया बोली

उसका जब भी
कोई सपना टूटा
एक चिडिया बोली

अब वह
सपना नहीं देखती
लेकिन वह चिडिया
रोज उसी तरह
बोलती है

चार

वह जब भी सोचती है – ‘कविता’
शुरू होता है फूलों का खिलना

वह जब भी कहती है ‘कविता’
फूल की एक पंखुरी टूटकर
गिरती है धरती पर

वह जब भी
एक पूरे सफेद कागज पर
कहीं लिखती है – ‘कविता’
शब्द कागज पर दूब की तरह
उग आते हैं
बिल्कुल ताजे और टटके

वह लड़की
कविता नहीं लिखती।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

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Comments 14

  1. राजेश चड्ढ़ा says:
    15 years ago

    विमलेश जी….कविता के मूल तत्व कुछ भी रहते हों…कहीं ना कहीं….किसी पटाक्षेप हेतु…..कुछ विस्तार की दरकार उन्हें होती है..लेकिन….संजय जी की इन कविताओं में…. सहजता… संप्रेषण…और….भावों की प्रबलता…अध्भुत है…
    प्रेम
    आस्मां का विस्तार है
    मैं आसमान से
    टहनिया तोड़ता हूं……..
    कमाल …आपका शुक्रिया….औ संजय जी के लिए शुभकामनाएं

    Reply
  2. rakesh ranjan says:
    15 years ago

    संजय समर्थ कवि हैं. उन्हें पहले भी पढ़ा है. ये कवितायें अपनी तरह की हैं जो कविता-भाषा की अलग पहचान बनाती हैं. आकार में छोटी और असर में गहरी! बधाई और मंगलकामनाएं!

    Reply
  3. deepti sharma says:
    15 years ago

    har kavita mai alagpan hai
    bahut khub
    …

    Reply
  4. रवि कुमार says:
    15 years ago

    बेहतर कविताएं…

    Reply
  5. shesnath pandey says:
    15 years ago

    बहुत बढ़िया कविताएँ… ट्रेन रूक गई है/आदमी दौड़ रहा है… हमारे समय का इससे अलग कोलाज और क्या हो सकता है… बधाई संजय…

    Reply
  6. vandan gupta says:
    15 years ago

    किस किस की तारीफ़ करूँ सभी एक से बढकर एक हैं और दिल मे उतर गयी हैँ……………बेहद उम्दा और बेहतरीन्।

    Reply
  7. vandan gupta says:
    15 years ago

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (17-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    Reply
  8. rahul singh says:
    15 years ago

    hindi ki sambhavnaon ko ek samananter manch muhaiyya kara rahe hai bhai.usi kari me sanjay ke samrthya ka kuch kuch anumaan hua.sanjay ko badhai.

    Reply
  9. Creative Manch says:
    15 years ago

    बहुत ही अच्छी रचनाएँ .खास कर पहली और दूसरी पसंद आयीं .

    राजेश जी की बात से सहमत .
    'मिलिए रेखाओं के अप्रतिम जादूगर से '

    Reply
  10. रंजना says:
    15 years ago

    वह जब भी
    जाती है बाजार
    एक टुकड़ा शहर ले आती है
    अपने पर्स में

    मेरे भीतर टूटता है
    एक गांव
    हर बार

    ……….

    वैसे तो हरेक क्षणिका पथ रोक खड़ी हो जाती है, मुग्ध भाव से बस ठिठके रह जाना पड़ता है…पर इसने तो गहरे वार किया…

    लाजवाब लिखा है …लाजवाब….

    Reply
  11. NEEL KAMAL says:
    15 years ago

    "prem" aur "wah ladaki-1" bahut sundar hain.sanjay ke liye shubh kamanayen.

    Reply
  12. Gurpreet says:
    15 years ago

    har kavita apne pas rukne ko kehati hai aur aap se baten karne lagti hai …. khubsurt hai yeh kaviteyan

    Reply
  13. Dar-Badar says:
    14 years ago

    tumhari kavitaen achchi lagi,kavita ke baare me jyada jankari nahi hai mujhe..bas padhkar sukoon sa laga…,bhari -bharkam shabdo ka bojh nahi hai tumhari kavitaon me….likhna jari rakhna.

    Reply
  14. राजीव रंजन says:
    14 years ago

    na koi adambar na koi chamatkar fir bhi bahut prabhavshali. sahaj sampreshya aur sundar kavitaen. ane vale daur ke sahitya men alag aur mahatvapoorn pahchan rakhegi apki rachanashilta.

    Reply

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अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

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