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Home समीक्षा

ज्ञानोदय में छपी कहानी “‘चिन्दी चिन्दी कथा” पर वरिष्ठ साहित्यकार प्रताप सहगल की प्रतिक्रिया

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in समीक्षा, साहित्य
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1
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ज्ञानोदय के जून अंक में छपी कहानी चिन्दी चिन्दी कथा पर पाठकों की इतनी अच्छी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। कहानी को इतनी प्रसंशा मिल रही है कि मैंने सोचा भी न था। राजस्थान से नंद भारद्वाज, मुबई से दुर्गेश सिंह एवं शेषनाथ पाण्डेय, गोरख पुर से सच्चिदानंद मिश्र, पानीपत से प्रदीप कुमार, यू.के. से सरिता झा, जयपुर से आनंद जैन, कोलकाता से प्रियंकर पालीवाल सहित मेरे अन्य अंतरंग मित्र, लखनऊ से देवेन्द्र कुमार, इलाहाबाद से संतोष कुमार चतुर्वेदी सबने कहानी पर अपनी राय व्यक्त की। इसके अलावा वीसियों नाम हैं कि लिखने बैठूं तो हाथ थक जाएं…..
सभी मित्रों को मेरा हार्दिक आभार…
यहां बरिष्ठ साहित्कार प्रताप सहगल की प्रतिक्रिया दे रहा हूँ….





नया ज्ञानोदय में चिन्दी चिन्दी कथा मैं पढ़ गया हूँ। पहले तो यह बताओ कि आप विमलेश हो या बिमलेश। एक ही नाम रखो तो भ्रम न होगा।
आपकी कहानी मुझे इसलिए पसंद आई है कि इसमें एक युवा मन के स्वप्न, सोच और भावुकता का अदभुत समंजन है। कहानी में तीन पीढ़ियाँ प्रवेश करती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे समाज को धर्म ने बुरी तरह से बाँट रखा है और वे हिन्दू तथा वे मुसलमान इसके सबसे बड़े शिकार हैं जो अपने-अपने धर्म के बारे में ही कुछ नहीं जानते और अगर कुछ जानते हैं तो उनमें अपने-अपने धर्मों की सीमाओं को चुनौती देने का साहस नहीं है। इस कहानी में खामोश चुनौती देता हुआ सूरा भी अन्तत: व्यैक्तिक स्तर की धर्मांधता का शिकार होता है । वेदांत की कायरता उन तमाम हिन्दुओं की कायरता है जो हिन्दुत्ववादी शक्तियों को खुली चुनौती नहीं दे पाते। आज किसी भी मुसलमान को आतंकवादी करार देने में पुलिस को बहुत वक़्त नहीं लगता। वेदांत और अरमन की दोस्ती भी हमारे समाज में व्याप्त सांप्रदायिकता का शिकार होती है। हम अभी तक व्यक्ति-स्वातन्त्र्य का सम्मान करना सीखे नहीं है। वेदांत और अरमन के स्वप्न समान हैं- इस दुनिया को बदलना। दुनिया की चाल अपनी है। जब मैं युवा था तो मैं भी ऐसे ही सोचता था, लेकिन तब ज़िन्दगी दो वक़्त की रोटी जुटाने में गुज़र गई। दुनिया बदलने का सपना अभी भी मरा नहीं, बस उसे बदलने का तरीका बदला। हमारे पास सिर्फ़ कलम है और विचार है। उस विचार को हम कलम के ज़रिय समाज तक पहुंचाएं। वही आपने इस कहानी में किया भी है। 
कहानी की बुनावट भी मुझे पसंद आई। अंत में वेदांत अली अरमन यह संकेत तो दे ही दे देता है कि छोटे स्तर पर ही सही, तमाम विरोधों के बावजूद बदलाव आ रहा है। इस बदलाव को समझना और रेखांकित करना इस कहानी की शक्ति है।मेरी बधाई और शुभकामनाएं विमलेश ! लिखते रहो। हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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Comments 1

  1. Anonymous says:
    16 years ago

    कहानी मैने भी पढ़ी ….जबरदस्त है…

    Reply

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अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

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