लोचन कोना -5
रचना का प्रतीत्यसमुत्पाद
प्रफुल्ल कोलख्यान
जैसे जोति से जोति वैसे रचना से रचना यानी प्रतीत्यसमुत्पाद
बात उन दिनों की है जब बूढ़े लेखकों को देखकर मेरे दिमाग में एक ही बात आती थी, इतना लंबा जीवन कैसे जिया होगा! कैसे जीया और हीया संभाला होगा! हम वहां पहुंच गए हैं जहां से हमको हमारी खबर नहीं आती! नोबेल प्राइज को आलू के बोरा की तरह से ठुकरानेवाले को हम कितना जानते हैं? हम पश्चिम बंगाल के नोबेल-संपोषित सांस्कृतिक सागर में इतने दिनों तक हिंदी के नाविक होने के मिजाज में रहने के अभ्यासी हैं, तो हमें सोचना होगा। इसलिए, कम-से-कम हम सब, जो इतने लंबे समय तक नोबेल पुरस्कार की छाया में सांस लेने के समाज साक्षी हैं, को इस सवाल का जवाब जानने की उत्सुकता होनी ही चाहिए। नहीं क्या?
हम सूचना विस्फोट के युग में वहां पहुंच गए हैं जहां से हम को हमारी खबर नहीं आती है। पहुंचा दिए गए हैं वहां तक जहां से अपनी कोई खबर नहीं आती है। व्यक्ति की आंतरिक दुनिया लगभग समाप्त हो गई है। विडंबना ही है कि हमारे समय में जो भी होता है लगभग में ही होता है। बाहरी दुनिया की हर हलचल से हम परिचित हैं, किन्तु अपने अनुभव, अपनी स्वतंत्रता, अपनी वास्तविक स्थिति और अपने तर्कशील चयन के प्रति जागरूकता क्षीण हो गई है। हमारे होने की स्थिति कहां होती है? भीतर या कहीं बाहर?
हमारे होने का यानी अस्तित्व का मूल-स्थान तो भीतर ही कहीं है। उस मूल-स्थान के होने का बहुत कुछ बाहर पर निर्भर करता है —- कुंभ में जल है, जल में कुंभ है. बाहर-भीतर पानी! हमारे होने का कोई पूर्वनिर्धारित सार या कार्यभार नहीं होता है। हम मनुष्य के रूप में जन्मजात अधिकार और जन्मसिद्ध स्वतंत्रता की रक्षा में दिलचस्पी खो देता है। निरंतर आती बाहरी खबरों में आदमी डूब जाता है। खबर जो है नहीं आदमी उस के नहीं होने में अपनी लुटिया डुबा बैठता है।
इस तरह से बाहरी खबरों में डूब जाना आदमी की बुरी आस्था की निकृष्ट अवस्था का द्योतक होता है। इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं को एक वस्तु की तरह अनुभव करने लगता है। एक ऐसा व्यक्ति जिस का अपना कोई, लक्ष्य नहीं वह किसी और के लक्ष्य में नत्थी हो जाता है। कई बार तो खुद ही आगे बढ़कर नत्थी हो जता है। ऐसा कभी साथ की प्रतिबद्धता के नाम पर या किसी अन्य कारणों से भी हो जाता है। फिर आदमी एक ऐसा व्यक्ति जिसकी खबर न बाहर से आती है, न भीतर से। खबर नहीं जो आती है वह खबर नहीं खबरों का खर्राटा है।
समाज देख रहा है कि सूचना विस्फोट के युग में हमारे लेखक वहां पहुंच गए हैं जहां से उन को हमारी खबर नहीं आती है। ऐसे में आदमी अपने व्यक्ति होने को खो देता है। व्यक्ति के बाहर-भीतर दोनों का स्वरूप और सत्व खो जाता है। व्यक्ति के अस्तित्व का कोई-न-कोई अंश संस्था बन जाता है। फिर यह छोटा अंश पूरे अस्तित्व पर कब्जा जमा लेता है। बाहर-भीतर दोनों की स्थिति और गति ऐसी कि बाहर की स्थिति भीतर की गति को रुद्ध कर देती है। किसी लेखक के लिए उस के व्यक्तित्व के खो जाने या बाहरी शक्तियों के कब्जे में चले जाने अधिक कठिनाई की बात और क्या हो सकती है? इस कब्जा के होने की खबर लेखक को हो तो दुखदाई, न हो तो और भी दुखदाई।
बाहर-भीतर के इसी दबाव और द्वंद्व के दो पाटन के बीच जिंदगी के पिस जाने की नीच ट्रेजडी को गजानन माधव मुक्तिबोध जानते भी थे और भोगते भी थे, जितना अधिक जानते थे उतना ही अधिक भोगते थे। मुक्तिबोध अपने भीतर के अस्तित्व को जानते थे और बाहर के प्रगतिवाद को जानते थे। इतना ही नहीं मुक्तिबोध अपने भीतर की प्रगति को भी जानते और बाहर के अस्तित्ववाद को भी जानते थे —- अपने भीतर के भव और बाहर के वाद दोनों को जानते थे! भीतर के भव और बाहर के वाद के मिलकर बननेवाले भाववाद के कब्जा में न आने की लड़ाई में जीवन भर फंसे रहे गजानन माधव मुक्तिबोध —- इस फंसान में बहुत अंधेरा था, अंधेरे में द्वीप भी बहुत थे और अंधेरे में कविता भी बहुत थी! थी अंधेरे की कविता! किसी पराए रोशनदान के नीचे से सब देख रहा था पाठक! पाठक जो पब्लिक नहीं था।
जहां भीतर के भव और बाहर के वाद में कोई द्वंद्व नहीं होता है वहां की रोशनी बहुत गुलाबी होती है। मूल बात यह है कि जब समय खुद आख्यान और संस्था दोनों बन जाता है तो अंततः लेखक के भीतर एक तरह का सूखा घर कर लेता है। बाहरी संस्था और संस्थित शक्ति हमारी कहानी छीन कर अपनी ही कहानी हमारे नाम से लिखने लगती हैं और हम खामोश! हम खामोशी के मजा के पीछे कहीं छिपने का सुख पा लेते हैं। खामोशी में तब एक दिन स्वयं की कहानी का स्रोत सूख जाता है। विशेष संदर्भ के लिए मन हो तो फिर से पढ़िए निर्मल वर्मा की कहानी ‘सूखा’!
ऐसे में क्या अचरज कि राजेंद्र यादव जैसा सिद्धहस्त लेखक न लिखने का कारण खोज लेता है और मेरे जैसा कोई पाठक उसी में अपने न पढ़ने का भी कारण खोज लेता है। जो भी हो, अपने व्यक्ति के संस्था बन जाने पर संस्थाओं में अपनी भूमिकाओं के माध्यम से कोई-कोई लेखक अपनी रचनाओं अपने व्यक्ति के पुनर्वास का कोई-न-कोई इंतजाम कर लेता है —- हालांकि, रचना में रचनाकार के निज का पुनर्वास हो इस के पहले कोई-न-कोई पुरस्कार रचनाकार के व्यक्ति को फिर से दबोच लेता है। पुरस्कार न मिले तो फिर प्रशंसा की ही छूछी पकड़ में पड़ जाता है।
धनंजय कुमार के यूट्यूब चैनल दी नागरिक पर प्रेमचंद की कहानी पर चर्चा के दौरान एस एक सवाल सामने खामोशी आया —- अब उस तरह की कहानियां क्यों नहीं लिखी जाती है! यानी जिस तरह की कहानियां प्रेमचंद लिखते थे? अब इस सवाल का जवाब जानना जरूरी है। कहां से इस सवाल का जवाब मिल सकता है? लेखक के बाहर से या फिर लेखक भीतर से!
क्या यह रचना के प्रतीत्यसमुत्पाद का मामला है? एक लौ की क्षति के बिना दूसरी लौ को शक्ति मिल जाती है। लौ तो लौ है! मगर फिर भी फर्क तो है! क्या फर्क? लेखक क्या पाठकों का गुरु होता है? लेखक और पाठक का रिश्ता क्या होता है? सात्र ने 1947 हमारे पास पाठक हैं लेकिन कोई पब्लिक नहीं है। हम अलक्षित रह जाने के समय में है। निराला ने 1935 में ही अपने अलक्षित, अनदेखे, उपेक्षित रह जाने की बात कह दी थी! अलक्षित रह जाना निराला के पूरे व्यक्तित्व सारांश है। निराला का ही क्यों? लेखक अलक्षित ही रहता है। हां कभी-कभी लेखक का हमशक्ल बनकर आसन जमाए संस्था जरूर लक्षित हो जाया करती है।
लेखक अपने पाठक से अपने रिश्ता को समझने में आजीवन लगा रहता है। और पाठक? वह तो है ही नहीं! लौ तो पाठक लगाता है। लेकिन बुझा हुए दीपक और रूठे हुए पाठक का लौ लगे भी तो कैसे? ऐसे में क्या तो रचना और क्या तो रचना का प्रतीत्यसमुत्पाद! काफी तो इतना भी है कि लेखक खुद को संस्था होने से बचा ले —- धुनी हो या लौ अपनी पसली में लगाकर रखे —- विशेष संदर्भ के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर के एकला चलो की पंक्तियों के स्पर्श करने की कोशिश की जा सकती है।
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प्रफुल्ल कोलख्यान वरिष्ठ चिंतक-आलोचक एवं कवि हैं।
संपर्कः prafullakolkhyan@gmail.com






