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Home कविता

पल्लवी त्रिवेदी की नौ कविताएँ

कविताई

by Anhadkolkata
September 11, 2026
in कविता
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पल्लवी त्रिवेदी

पल्लवी त्रिवेदी की इन कविताओं की बड़ी विशेषता यह है कि इनमें दैनिक जीवन के बेहद साधारण अनुभवों से गहरे दार्शनिक, मानवीय और अस्तित्वगत अर्थों की खोज की गई है। कवयित्री फूल, तितली, कछुआ, कंधा, पेड़, नदी, आँसू, चुप्पी और स्मृति जैसे सहज बिंबों के माध्यम से प्रेम, दुःख, अकेलेपन, गरिमा, करुणा, श्रम, स्त्री-अनुभव और मनुष्य की प्रकृति से अंतर्संबद्धता को देखती हैं। भाषा आत्मीय, संवेदनशील और संवादधर्मी है, जबकि बिंबों में कल्पनाशीलता और विचार की गहरी अंतर्धारा है। विशेष रूप से ‘कंधा’, ‘अनामंत्रित’ और ‘चुप्पी’ जैसी कविताएँ निजी अनुभव से सामाजिक यथार्थ तक पहुँचती हैं और व्यक्ति के दुःख को व्यापक मानवीय दुःख में बदल देती हैं।

इन कविताओं में प्रेम अनुपस्थिति में भी उपस्थित है, दुःख एक सघन अनुभव है, प्रकृति सहचर और दार्शनिक है तथा चुप्पी प्रतिरोध और आत्मगरिमा का रूप धर लेती है। कुल मिलाकर, ये कविताएँ संवेदना, स्त्री-दृष्टि, प्रकृति-बोध और जीवन-दर्शन का ऐसा संगम रचती हैं जिसमें निजी पीड़ा धीरे-धीरे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव में बदल जाती है।

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तो आइए अनहद कोलकाता पर पढ़ते हैं पल्लवी त्रिवेदी की कविताएं। आपकी राय का तो इंतजार रहेगा ही।

 

कर्ज़

 

फूल और तितली का रिश्ता तो दुनिया भर को मालूम है

कछुए और तितली का भला आपस में क्या रिश्ता ?

 

जितना अचरज भरा ब्रम्हांड है

उसके नियम और तौर तरीके भी उतने ही अचरज भरे

यहाँ हर कोई कर्जदार है

और कर्ज चुकाने को बाध्य भी

इस ब्रम्हांड को एक साहूकार चला रहा है।

 

फूलों का कर्ज चुकाए बिना तितली की मुक्ति सम्भव नहीं

इसलिए तितलियाँ चली आती हैं उन कछुओं के आँसू पीने

जिन्हें खुद भी समंदर के नमक का कर्ज़ अदा करना है ।

 

मैं नेशनल जियोग्राफिक देखते हुए सोचती हूँ

कितना कर्ज़ इस देह और आत्मा पर लाद रखा है हमने

मृत्यु तो सिर्फ देह को वापस प्रकृति को सौंपेगी

 

आत्मा को तो तितली होना ही होगा

कुछ उदास आंखों के आँसू पीने ही होंगे।

 

दुःख

 

एक रोज़ सुख-दुख की पड़ताल करते हुए जाना कि

जीवन के हज़ार सुखों में अनुपस्थित था महज प्रेमी के साथ का सुख

वह अनुपस्थित सुख ही मेरा एकमात्र दुःख था

 

दुख का घनत्व सुख से कई गुना ज्यादा होता है

सुख अपने बड़े आकार से अपनी बहुलता का भ्रम रचता रहा

जबकि कण भर के दुख का वजन मन भर का था

 

न दुःख में प्रेमी का साथ मिला,  न सुख में

हां..साथ की उत्कंठा कन्धे पर बेताल की तरह बैठी रही

 

कभी-कभी उम्मीद नाम की छोटी तितली भी आकर हथेली पर बैठ जाती

पर उसके सहारे सुख को थोड़ा जीने की कोशिश की जाती,

इससे पहले वह उड़ जाती

 

काश बेताल तितली होता और तितली बेताल

तब शायद दुःख को जीता जा सकता था

 

फिर एक दिन बेताल भी उतर गया , तितली भी उड़ गई

तब मैंने हृदय को टटोला कि

दुख की खाली हुई जगह पर जल्दी से किसी सुख को रख दिया जाए

 

पर दुख वहीं था….

उतना ही ठोस और सघन ।

 

अब यह बेताल और तितली की अनुपस्थिति का दुःख था

 

स्मृति

 

एक बार फिर जाड़े की सिहराती बारिश

फिर वही कोहरे की सलेटी गन्ध से भरी सुबहें

 

ऐसे कई जाड़े आएंगे

मैं हर बार अकेले कोहरे भरी सड़क पर चलूंगी

 

हर बार एक वर्जित इच्छा की स्मृति ज़िंदा हो उठेगी और

करेगी मेरे हृदय का आखेट

मैं लहूलुहान फिर भी चलती जाऊंगी … धुंध को गहरी-गहरी साँसों से पीते हुए

( और विकल्प क्या है मेरे पास )

 

क्या अपना सुग्गा ठुड्डी पर चोंच मारे

तो उसे कंधे पर नहीं बिठाएंगे ?

 

कंधा

 

जब दुखता है कंधा तो लगता है मानो

ब्रहस्पति को सूरज के चक्कर काटते हुए चक्कर आ गया हो और

निढाल हो गिर पड़ा हो इसी कांधे पर

 

जब दुखता है कंधा तो इतना भारी हो जाता है

मानो पुत्र की चिता जलाकर लौटते पिता की छाती हो

या कारावास भोगते किसी बेगुनाह की बद्दुआओं से भारी हुई हवा।

 

अनवरत दुखता कंधा ऐसा व्याकुल हो रहता

जैसे याद के वजनी पत्थर के नीचे

सांप की पूँछ-सा बिलबिलाता दिल।

 

और तेज़ जब होती है कंधे की कसक

तो अपने जैसों को अनायास स्मरण कर उठता है मन

‘और कौन है जो चल रहा दुखते कंधे को ढोते हुए ‘

 

पहले सर्वाइकल और फ्रोजन शोल्डर के मरीज रहे इक्का दुक्का दोस्त याद आते हैं

फिर याद आता है एक परिचित

दुर्घटना में टूटी हड्डी तो जुड़ गई लेकिन कंधे की पीर बनी रही ताउम्र

 

याद का वर्तुल फैलता है

एक सहेली के एक कंधे पर बरसों से टिका था ऑफिस और दूजे पर घर

रात भर हर करवट पर दर्द से टसकते रहते बारी बारी

एक बार मुँह से निकल गया था ‘ कभी तो आदमियों को भी खाना बनाना चाहिए ना ‘

फिर फ़िक़्क़ से ऐसे हँसी थी जैसे बड़ा भारी मज़ाक किया हो

 

एक रिक्शावाला झटकता था अपना बायां कंधा जल्दी जल्दी ,

पूछने पर कहता था-

‘बस चढ़ाई पर सवारी ज़रा-सा उतर जाए तो बुढापे का यह कंधा खींच लेगा रिक्शा ‘

 

वजनी बस्तों से झुके बच्चों के कंधों को दबाने की इच्छा हो आयी

अपने कंधे की मसल्स को धीरे धीरे दबाते हुए

 

याद का वर्तुल बड़ा हो रहा

फैलकर शहर के बराबर हुआ

दिनरात पहियों के बोझ उठाते सड़कों के कंधों पर कौन लगाता होगा वॉलिनी

 

वर्तुल वामन के आकार की भांति फैल रहा

 

नदियों के कंधे भी घड़ियालों के नहीं बल्कि प्लास्टिक के बोझ से पिराते होंगे

पर्वतों की रीढ़ विशाल देवदारों से नहीं बल्कि कंक्रीट से टूट जाती है

 

थोड़ी सिंकाई से कंधा बस थोड़ा बेहतर लगा ही था

कि यह वर्तुल फैलकर पृथ्वी के नाप का हो गया

 

ओह एटलस… तुम्हारे कंधे के क्या हाल हैं दोस्त ?

 

फिर दुखता रहा कंधा देर तक

मैंने भी अब के दुखने दिया ।

 

सीख

 

किसी को सुबकने का एकांत देना दुःख का सम्मान करना है

किसी की हँसी में साथ देना खुशी की कद्र करना है

 

थाली किसी की भी हो,

उसके पहले निवाले पर भूखे का हक़ है।

प्रेम पर प्रथम अधिकार नमी खो चुके हृदय का है

 

कुछ सीखें कोई गुरु नहीं दे सकता

यह आत्मा को स्वयं सीखना होता है समय की धार पर घिसकर

 

बूढ़ी आंखें जो देख पाती हैं मोतियाबिंद के बावजूद

वो दृश्य जवानी के हिस्से नहीं आते।

 

और जो अगर इतना जान गयी  है तुम्हारी आत्मा

तो समझ लो

वह चौकन्ने बारहसिंगा की आंखों में भरोसा चीन्ह सकती है

किसी कछुए की मंथर गति को श्वास से जोड़ सकती है

किसी चटटान के अदृश्य अश्रुओं से भींज सकती है

किसी फागुन की भोर में महुए की टपक भर से इश्क़ के नशे में झूम सकती है

 

समय एक नदी है

मनुष्य वो अनगढ़ पत्थर जिसे सदियों से तराश रही है जल-धार ।

 

जो तेज़ धार में चूर-चूर होकर रेत नहीं हुए

वही कहलाये शिव

उन्हीं को तो मिल सका सौभाग्य

प्रकृति को अर्धांग के रूप में धारण करने का।

 

अनामंत्रित

 

वो रोज़ तयशुदा वक़्त पर आता था

कभी अख़बार पढ़ने के बहाने

कभी घर के पके अमरूद देने के बहाने

तो कभी पेंचकस या गुलाब-कटर मांगने के बहाने

 

और फिर बैठा रहता घण्टों।

 

घर भर के लिए वो अनामंत्रित था

लेकिन अपने घर में अनचाहा सदस्य होने से बेहतर है

दूसरों के घर अनचाहा मेहमान होना

सो चला आता था रोज़ इस घर में ..

 

बरामदे में बेंत की कुर्सी पर सिकुड़ा बैठा अखबार फैलाकर पढ़ता रहता

सबसे आंखें चुराते हुए,

कभी कभार कोई वज़नी सामान उठाने में गृह स्वामिनी की मदद कर देता

कभी छोटे बालक को गणित का सवाल हल करवा देता।

कानों में पड़ने वाले एक-आध कटाक्ष को वह अनसुना कर देता।

 

कभी चाय नहीं पीता, कभी शिकंजी नहीं पीता,

नाश्ते के लिए कहता रहा सदा कि पेट भरा हुआ है ,नहीं खा सकेगा

पानी कभी-कभी पी लिया करता गर्मियों में

पंखा चलाने को भी कभी नहीं कहा उसने

 

वह कृतज्ञता से भर उठता चाय-पानी पूछने भर से

वह एक भी बार चाय पीकर इस पूछे जाने के सिलसिले को खत्म नहीं करना चाहता था

इससे दोनों का सम्मान बना हुआ था।

 

उसके चेहरे पर जाने क्या लिखा था विवशता की भाषा में

जो पढ़ सकी थी इस घर की स्वामिनी

कि कभी नहीं पूछा कि

‘ रोज़ क्यों आ जाते हो ?’

 

दोस्त कभी रहे होंगे उसके ,जो अचानक से अदृश्य हो गए थे

मोहल्ले की पान की दुकान पर उसका ख़ाता कब का बन्द हो गया था

सुबह शाम घिसे तले के जूते पहन घण्टों वॉक किया करता

पार्क में कदम्ब के नीचे बेंच पर अक्सर किसी किताब में नज़रें गड़ाए दिखाई पड़ता

 

वह उतना न्यूनतम आदर भी नहीं चाहता था

जितना अधिकार जन्म लेते ही मिल गया था उसे एक  मनुष्य होने के नाते

बस घोर निरादर की जलालत से खुद को बचाने की कोशिश में था,

सैंतीस बरस का वह बेरोजगार युवक इन दिनों।

 

यात्रा

 

पेड़ हमेशा एक जगह खड़ा दिखाई पड़ता था

पेड़ की जड़ें केंचुओं की उँगली थाम

धरती के भीतर मीलों तक घूम आती थीं

पत्तियां परिंदों की पीठ पर बैठ जब-तब आकाश की सैर कर आतीं

और फूलों को तो तितलियाँ और भँवरे खुद काँधों पर लिए फिरते दुनिया भर में

 

एक पूरे जीवन में पेड़ सारी दुनिया कई बार घूम लेता

नदी किनारे रहते पेड़ पानी के भीतर भी तैर आते

संसार का सारा पानी एक ही पानी है

जैसे सारी हवा एक ही हवा है

 

पेड़ के नीचे थके-हारे सोये लकड़हारों के स्वप्न में पेड़ सफर की कहानी कहता

जब पेड़ सोता तब उसके स्वप्न में जानवर अपनी गाथाएं कहते

जानवरों के सपनों में परिंदों के किस्से होते हैं और

मछलियों की नींद में नावें अ यात्रा की कहानियां सुनाती हैं

 

सपनों में देखी गईं अदृश्य जगहें और घटनाएं

दरअसल किसी और का यात्रा वृतांत है

नींद क़िस्सागोई का सबसे रोचक ठिकाना है

 

एक पेड़ इतनी यात्राएं करता है कि उसकी सन्तानें विश्व भर में फैली हैं

 

मैं एक सेमल का वृक्ष हूँ और सेमल का लाल पुष्प मेरा हृदय है

संसार की सारी कोशिकाएं एक ही कोशिका हैं।

 

देह जब सबसे थिर होती है

चिर यायावर मन तब भी जाने कहाँ-कहाँ की यात्रा पर रहता है

मन की यात्रा के क़िस्से प्रेमी के स्वप्न में दर्ज होते हैं

 

जब मैं उदास होती हूँ तो आँगन में खड़ा आम मुरझाया-सा लगता है

मैं पूछती हूँ उसकी बूढ़ी छाती से लिपटकर

ए मेरे पुरखे …क्या संसार के सारे मन भी एक ही मन है ?

 

 

गरिमा

 

रागों की शास्त्रीय मिठास नहीं होती हर कान के लिए

रागों के सम्मान के ख़िलाफ़ है कि

उन्हें गाया जाए किसी अ-रसिक के समक्ष

 

और ठीक इसी तरह बरता जाए आँसुओं को भी।

किसी निष्ठुर के सामने रुदन करना

अश्रुओं की गरिमा के विरुद्ध है

 

सु-पात्र न मिले, तो बेहतर है कि

रागों और आंसुओं को खिलने दिया जाए

एकांत की रेशमी ओट में।

 

चुप्पी

 

मेरे मन की अथाह शांति उनके लिए नीरसता थी

मेरी संतुष्टि को वे महत्वाकांक्षा की कमी कहते रहे

मैंने तन्ख्वाह पर बा-ख़ुशी जीवन बसर किया

उन्होंने संतोष जताते हुए  इसे स्त्रियोचित गुण बताया

अगर मैं पुरूष होती तो वे मुझे डरपोक कहकर खिल्ली उड़ाते

 

मैंने कुतर्कों के जवाब में चुप्पी साधी

मैं कायर कहलाई

मैंने मूर्खों से उचित दूरी बनाए रखी

मूर्खों की सारी जमात ने मिलकर मुझे घमंडी का तमगा पहनाया

 

मेरी यायावरी से मैं उनकी ईर्ष्या का पात्र बनी

जो कुर्सी के मोह में कभी लंबी छुट्टी न ले सके

मेरी आज़ाद तबीयत ने उनकी छिपी हुई कुंठा को निर्ममता से बाहर निकाला

और मैं उनकी महफिलों में गॉसिप का मुद्दा बनी

 

वे चाहते थे कि या तो मैं भी उनके जैसी हो जाऊं

या मैं उन्हें अपने जैसा समझती रहूं

वे जटिल जीवन जीते हुए सरल नज़र आना चाहते हैं

मैं उनकी सरलता की गौरव-गाथा सुनते हुए अपनी कुख्यात चुप्पी साध लेती हूँ ।

***

पल्लवी त्रिवेदी का जन्म 8 सितम्बर, 1974 को ग्वालियर, मध्यप्रदेश में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा मुरैना व शिवपुरी में हुई। उच्च शिक्षा मंडला और शाजापुर में हुई। वर्ष 2000 में वे मध्यप्रदेश में उप पुलिस अधीक्षक के रूप में नियुक्त हुईं।

पल्लवी की प्रकाशित कृतियाँ हैं-

1- ‘अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा’ (व्यंग्य-संग्रह)

2-‘तुम जहाँ भी हो’ (कविता-संग्रह)

3-ख़ुशदेश का सफ़र’ ( यात्रा वृत्तांत)

4-‘ज़िक्रे यार चले- लवनोट्स ( प्रेम कथा संग्रह)

5-पत्तियों पर काँपता कोमल गांधार  ( कविता संग्रह

उनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। लेखन के अतिरिक्त वे प्रकृति प्रेमी हैं व यात्राओं, संगीत व फ़ोटोग्राफ़ी का शौक रखती हैं। बर्ड फ़ोटोग्राफ़ी में उनकी विशेष रुचि है ।

सम्मान-

‘तुम जहाँ भी हो’ पुस्तक के लिए उन्हें 2020 में मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठित ‘वागीश्वरी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2023 में पत्रिका समाचार पत्र का प्रतिष्ठित ‘नायिका सम्मान ‘ प्रदान किया गया है।

वीणा वेणु फाउंडेशन द्वारा साहित्य के लिए 2022 का ‘ दुर्गा सम्मान ‘ दिया गया है।

पुलिस विभाग में सराहनीय सेवा के लिए उन्हें ‘राष्ट्रपति पुलिस पदक’ से सम्मानित किया जा चुका है।

एक शॉर्ट फिल्म ‘ thank you for listening’ का सह-निर्माण, लेखन ,सह-निर्देशन और अभिनय ।

सम्प्रति : मध्यप्रदेश में राज्य पुलिस सेवा की अधिकारी। वर्तमान में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ,भोपाल में ए.आई.जी. के रूप में पदस्थ।

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