देवर्षि सारोगी एक विशिष्ट बंगाली कथाकार और उपन्यासकार हैं, जो अपनी मौलिक आवाज़ और कल्पनाशील साहित्यिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। उनकी कृतियाँ रोजमर्रा की वास्तविकता को सपनों, अवचेतन, कल्पना और रूपक के साथ सहजता से पिरोती हैं, जिससे एक अनूठा काल्पनिक जगत बनता है जहाँ न केवल आम लोग बल्कि ईश्वर और शैतान जैसी प्रतीकात्मक आकृतियाँ भी निवास करती हैं। इन आख्यानों के माध्यम से वे मानव अस्तित्व, नैतिकता और सत्य के गहरे प्रश्नों की पड़ताल करते हैं।
सारोगी ने अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर बनने से पहले एक पत्रकार के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की थी। उनके कई प्रशंसित कथा-संग्रह और उपन्यास प्रकाशित किए हैं, जिनमें ‘राजार ग्यानतृष्णा’, ‘गल्पकुञ्ज’, ‘आमि एभाबे बेचेछिलाम। अपनी?’, और ‘लेखकजीवन’ शामिल हैं। बंगाली साहित्य में उनके योगदान को भारत सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार दोनों के साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। देवर्षि सारोगी एक विशिष्ट बंगाली कथाकार और उपन्यासकार हैं, जो अपनी मौलिक आवाज़ और कल्पनाशील साहित्यिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। उनकी कृतियाँ रोजमर्रा की वास्तविकता को सपनों, अवचेतन, कल्पना और रूपक के साथ सहजता से पिरोती हैं, जिससे एक अनूठा काल्पनिक जगत बनता है जहाँ न केवल आम लोग बल्कि ईश्वर और शैतान जैसी प्रतीकात्मक आकृतियाँ भी निवास करती हैं। इन आख्यानों के माध्यम से वे मानव अस्तित्व, नैतिकता और सत्य के गहरे प्रश्नों की पड़ताल करते हैं।
मौत
देवर्षि सारगी
अनुवाद एवं प्रस्तुतिः शुभ चक्रबर्ती
मुझे क़त्ल करने के लिए तड़के-तड़के उस मक़्तल (बध्यभूमि) की तरफ़ ले जाया जा रहा था। जो शख़्स मुझे ले जा रहा था, उसने मेरा हाथ नहीं थाम रखा था। शायद वो समझ चुका था कि मैं भागूँगा नहीं। वैसे भी, मौत से भला कौन भाग पाया है? और देखा जाए तो जल्दी मरने और देर से मरने के बीच सिर्फ़ वक़्त का ही फ़र्क़ तो है। फिर ज़माने और महाकाल के इस असीम विस्तार में दस-बीस साल कम या ज़्यादा होने की क्या बिसात?
मैंने आज तक किसी क़ातिल का ऐसा पुर-सुकून चेहरा नहीं देखा था। आँखों में या चेहरे पर कहीं बेरहमी का नामो-निशान तक न था। शांत, झुकी हुई निगाहों से वो सुबह-काज़िब की सोई हुई सड़क पर आहिस्ता-आहिस्ता चला जा रहा था। मैं भी उसके पहलू में यूँ चल रहा था जैसे उसकी किसी सिहरी जादूई जंजीर में क़ैद हो गया हूँ। भागने की कोई ख़्वाहिश मुझे महसूस नहीं हो रही थी—यह भी शायद उसी की किसी सम्मोहन-क्रिया का असर था। एक लम्हे को लगा कि अगर वो मुझे अकेला छोड़कर चला भी जाए, तो भी मैं यूँ ही चलते-चलते अकेला ही उस मक़्तल तक पहुँच जाऊँगा! यह शहर मेरे लिए अजनबी था, फिर भी अकेले मक़्तल तक पहुँचने में मुझसे कोई चूक न होती। जिस रास्ते के आख़िर में मौत खड़ी हो, उस पर क़दम रखने में कोई इंसान ग़लती नहीं करता, चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो।
आस-पास का वो धुंधला सा मंज़र बड़ा भला लग रहा था। मैं मन ही मन हर चीज़ से रुख़सत ले रहा था। या शायद वे सब चीज़ें मुझे अलविदा कह रही थीं। एक बार को लगा कि शायद मैं अपने ही किसी ख़्वाब की गलियों में टहल रहा हूँ। और अगर वापस घर चला जाऊँ, तो शायद देखूँगा कि मैं अपने बिस्तर पर आराम से सोया पड़ा हूँ। लेकिन उस सूरत में तो मुझे बिस्तर पर सोए हुए उस ‘मैं’ को झकझोर कर जगाना पड़ेगा, ताकि वो इस क़ातिल की ज़द से भाग सके। मगर इस सब का मुझमें कोई उत्साह न था। मैं तो पानी की उस धारा की तरह हो चुका था जो ऊपर से नीचे की तरफ़ ढलान पर बहती है। उल्टी दिशा में बहना जिसके लिए सरासर नामुमकिन है।
साथ चल रहा वो शख़्स उसी तरह मुस्कुराते चेहरे के साथ, निगाहें नीची किए चुपचाप चलता रहा। मैं भी किसी मस्मराइज्ड इंसान की तरह उसके साथ-साथ था। बीच-बीच में थोड़ा पीछे छूट जाता। वो कोई बात नहीं कर रहा था, इससे मुझे एक अजीब सा इत्मीनान था, क्योंकि बात करने का दिल मेरा भी नहीं था। ऐसे लम्हों में इंसान सिर्फ़ सोचना चाहता है, महसूस करना चाहता है। कभी-कभी अलबत्ता सब कुछ आपस में गड्ड-मड्ड हो जाता, जबकि जो होने जा रहा था, वो मौत जैसी एक निहायत कुदरती और आम सी बात थी। मैं डर से बचने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा था। मुझे लगा कि अगर मैं डर गया, तो बूचड़ख़ाने के बाहर बँधे उन बेज़ुबान जानवरों से भी ख़फ़ीफ़ हो जाऊँगा, जो उस वक़्त ज़रा भी नहीं डरते। उनके न डरने की वजह बस यह है कि उनमें ‘मौत का इल्म’ नहीं होता। मौत के इसी इल्म ने इंसान को जहाँ अज़ीम और त्यागी बनाया है, वहीं खौफ़ज़दा भी कर दिया है। मैं न तो अज़ीम हूँ और न ही त्यागी, मगर फिर भी खौफ़ज़दा होना मुझे मंज़ूर न था। डर से निजात पाने के लिए मैं उस लम्हे जानवरों जैसी बे-फ़िक्र चेतना अपनाने को भी तैयार था। मन ही मन डर के ख़िलाफ़ कुछ मंतिक़ गढ़ रहा था, और हर तर्क मुझे हैरानकुन हद तक ताक़तवर महसूस हो रहा था।
एक गहरे मोड़ से वो शख़्स दाहिनी तरफ़ मुड़ा। मोड़ के पार जो मकान नज़र आए, वे बेहद क़दीमी थे। सीलन और शोरे से जर्जर ईंटों की क़तारें। बीच-बीच में मोतियाबिंद की आँख जैसे ठहरे हुए ठंडे तालाब। एक उजड़े हुए खंडहर के किसी सुराख़ से एक सुरमई बिल्ली सड़क पर कूद पड़ी। दूर की एक सुनसान गली में एक बिना घुड़सवार का घोड़ा बड़ी तेज़ रफ़्तार से दौड़ता हुआ ओझल हो गया—मानो सीधा आसमान में उड़ गया हो। बहुत दूर से किसी ट्रेन की सीटी की आवाज़ कानों में पड़ी। एक पुरानी लटकती हुई बाल्कनी में एक औरत झुककर झाड़ू लगा रही थी। पौ फटने को थी, भोर हो रही थी।
इतने वक़्त में पहली बार मैंने इन तमाम मंज़र को ज़बरदस्ती भूलना चाहा। इन नज़ारों में कहीं न कहीं एक मोह था, एक अजीब सी कशिश थी, जो मुझे तकलीफ़ दे रही थी। मौत के मुहाने पर खड़े इंसान को मौत के सिवा किसी और चीज़ से दिल नहीं लगाना चाहिए; तभी वो बिना किसी ख़ौफ़ के मर सकता है।
“वो यहीं आएगा,” एक बेहद टूटे-फूटे खंडहर के सामने रुककर उस शख़्स ने अचानक कहा। दोनों तरफ़ बाँस के झाड़ और घना जंगल था।
“कौन?” मैंने एक फ़ज़ूल सा सवाल किया।
“वही, जो तुम्हारा क़त्ल करेगा।”
मैं बिना कुछ समझे चुपचाप खड़ा रहा। यह भी बड़ी अजीब बात है कि मौत के ठीक ऐन क़बल भी इंसान सब कुछ समझ लेना चाहता है।
अगले ही पल मकान के भीतर के शफ़्फ़ाफ़ अँधेरे से एक आदमी बाहर निकला। उसे देखकर मैं दहल गया, और पहली बार मेरे अंदर एक तल्ख़ ख़ौफ़ सरक आया। उस आदमी को मैं पहचानता था। वो मेरा बरसों पुराना दुश्मन था—वही, जिसने एक बार मेरे पीछे नशे में धुत अल्सेशियन कुत्तों का जोड़ा छोड़ दिया था।
वो मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। हाथ में एक बड़ी कटार थी। होंठों पर एक तल्ख़ मुस्कुराहट।
“तुम जाओ,” उसने मेरे साथ आए उस शख़्स से कहा, “तुम्हारा काम हो गया।”
“हाँ, मेरा काम पूरा हुआ,” उस शख़्स ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा। वो टकटकी बाँधे मुझे देखता रहा। मैं भी अपनी नज़रें हटा नहीं पा रहा था। पहली बार उसके उस पुर-सुकून चेहरे पर रंज का एक बारीक सा साया उभर रहा था—जैसे पूरब के आसमान में भोर की पहली हल्की सी किरण।
“मैं जानता हूँ तुम ज़्यादा ख़ौफ़ज़दा नहीं हो,” उसने कहा। “यह फ़तह तुमने कैसे हासिल की?”
इतनी देर से जो सोच मेरे मन में सबसे ज़्यादा घूम रही थी, वही सादगी से कह दी:
“पैदा होने से पहले मैं नहीं था। जब उस बात से मुझे कभी डर नहीं लगा, तो मौत के बाद न रहने की सोच से भला क्या डरना!”
वो शख़्स उसी तरह टकटकी लगाए मुझे देखता रहा। फिर अचानक मुस्कुरा पड़ा। उसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता सामने के खुले मैदान की तरफ़ चलने लगा और मुझे हैरान छोड़ते हुए भोर के आसमान में विलीन हो गया।
“घुटनों के बल बैठो और गर्द झुकाओ,” मेरे दुश्मन ने भारी आवाज़ में कहा। “और यह जान लो, तुम्हें हलाक करने का मुझे ज़रा भी मलाल नहीं होगा।”
उसकी बात मानकर घुटनों के बल बैठकर गर्दन झुकाते वक़्त मेरे ज़ेहन में अचानक एक अनाम, नीच और दयनीय विचार आया—कि एक दिन तो यह आदमी भी इस ज़मीन पर नहीं रहेगा।
…काफ़ी देर तक मैं अपने ही ख़ून के दरिया में तड़पता और छटपटाता रहा। फिर एक बुलंद क़हक़हे की आवाज़ आई। मानो किसी वीरान, असीम बरसाती दलदल के ऊपर से परिंदों का एक डार सुरीली आवाज़ में चहचहाता हुआ उड़ गया हो।
मेरे सामने वही शख़्स खड़ा था—जो ख़ुद क़ातिल नहीं था, मगर मुझे क़ातिल तक पहुँचा गया था। उसके चेहरे पर अब भी वही तबस्सुम थी। मगर वो शख़्स कौन था और उसने मुझे मेरे दुश्मन के हवाले क्यों किया, मैं समझ न सका। फिर भी एक अचरज से भरकर मैं भी हंस रहा था, और मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“एक बात का जवाब दो,” उसने एक दोस्त की तरह मेरा हाथ थामकर कहा, “मौत के ख़ौफ़ को मिटाने के लिए कौन सा ख़याल ज़्यादा कारगर है? यह कि मौत ही सब कुछ का ख़ातमा है? या यह, जो तुम अब समझे हो कि मौत जैसी कोई चीज़ है ही नहीं?”
“मैं अपनी पहली राय नहीं बदलूँगा,” मैंने हंसते हुए कहा। “पहला ख़याल ही ज़्यादा कारगर है। क्योंकि यह जानना कि मौत नहीं है, इसका मतलब यह जानना है कि मुझे दोबारा ज़िंदगी मिलेगी—और फिर इस ख़ौफ़ में दोबारा मुब्तिला होना पड़ेगा कि एक दिन फिर मरना है!”
अनुवादक का परिचय
शुभ चक्रवर्ती बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध कवि हैं। बांग्ला के साथ-साथ वे हिंदी और अंग्रेज़ी में भी लेखन करते हैं और विश्व साहित्य का अनुवाद करते हैं। वर्तमान में उनका साहित्यिक कार्य मुख्यतः रवीन्द्रनाथ ठाकुर और मिर्ज़ा ग़ालिब के साहित्य के अध्ययन, लेखन और अनुवाद पर केंद्रित है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं— ‘तुमार सृष्टिर पथे’ और ‘छंदेर बंधने मुक्ति’। इसके अतिरिक्त ग़ालिब के पत्रों, कविताओं, शायरी तथा विभिन्न साहित्यिक विषयों पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। कविता, अनुवाद और भारतीय साहित्य की विविध परंपराओं पर उनका अध्ययन और लेखन निरंतर जारी है।

शुभ चक्रबर्ती
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