नरेश चंद्रकांत नायक की कहानी ‘जोगवण’’ खेती-किसानी के संकट, बदलते सामाजिक मूल्यों और नई पीढ़ी के जीवन-बोध में आए परिवर्तन की मार्मिक कथा है। कहानी का वृद्ध किसान अपनी शारीरिक विवशता के कारण खेतों में काम करने में असमर्थ है, लेकिन खेती से उसका भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव अब भी गहरा है। उसके लिए खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत, परंपरा और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। इसके विपरीत, नई पीढ़ी खेती की कठिनाइयों से बचकर शहरों और विदेशों में बेहतर भविष्य तलाशना चाहती है। कहानी आधुनिक विकास की चमक के बीच कृषि-संस्कृति के क्षरण, ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं और परंपरा के टूटते संबंधों को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। अंत में बेटे का हल जोड़ने बैठना वृद्ध किसान के मन में आशा का संचार करता है। यह अंत संकेत देता है कि बदलते समय के बावजूद अपनी जड़ों की ओर लौटने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
सरिता सैल द्वारा किया गया अनुवाद सहज, प्रवाहपूर्ण और कथ्य के अनुकूल है। अनुवाद में मूल कहानी की ग्रामीण जीवन-संस्कृति, कृषि-कर्म से जुड़ी शब्दावली, स्थानीय आस्थाओं और पीढ़ियों के बीच बदलते संबंधों को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। संवादों की स्वाभाविकता और वर्णनात्मक भाषा कहानी के परिवेश को जीवंत बनाती है। विशेष रूप से जोगवण, नागदेवता, कोतवाल और खेती से जुड़े स्थानीय संदर्भों के माध्यम से गोवा के ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक विशिष्टता उभरकर सामने आती है। हालाँकि, कुछ स्थानों पर वाक्य-विन्यास और अभिव्यक्ति में हल्की असहजता दिखाई देती है, जिसे अधिक मुहावरेदार हिंदी के प्रयोग से दूर किया जा सकता है। समग्रतः अनुवाद मूल कथ्य, संवेदना और सांस्कृतिक संदर्भों को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने में सफल है।
गड़े मुर्दे उखाड़ने का अब क्या प्रयोजन? यह सोचते-सोचते पिता ने एक दीर्घ श्वास छोड़ा। हाथ में सुलगती बीड़ी और भीतर चल रहे विचारों का धुआँ बाहर आकर हवा की तरंगों पर तैरता हुआ दूर तक फैल गया।
बाहर हल्की बूँदाबाँदी शुरू हो गई थी। इस आषाढ़ में उन्हें बिछौने पर पड़े-पड़े एक वर्ष होने को आया था। जैसे-जैसे बारिश तेज होती गई, उनका मन छटपटाने लगा। स्मृतियों का बवंडर भीतर उठने लगा। उनका जी चाहता था कि फावड़ा और कुदाल लेकर खेत में जाएँ और जी भरकर मेहनत करते हुए मिट्टी के साथ नृत्य करें। पर जैसे ही वे बिस्तर से उठने का प्रयास करते, अपने अपाहिज होने का ध्यान आते ही मन की उमंग धरी की धरी रह जाती। इतने वर्षों तक बाप-दादाओं से विरासत में मिली खेती वह अब तक पूरे श्रम और निष्ठा से करते आए थे। इस परंपरा को उन्होंने कभी खंडित नहीं होने दिया था।
तभी उनकी पत्नी छोटी-सी कटोरी में सिलबट्टे पर पीसी हुई दवा लेकर आई। उसकी तीमारदारी बीमारी से जल्द उबरने की हिम्मत देती थी। पत्नी मन-ही-मन सोचती कि चार लोगों के बीच सुहागिन कहलाने का अधिकार भगवान उससे न छीने।
“क्या हुआ? छत पर आँखें गड़ाए क्या देख रहे हो?”
“अब छत पर आँखें भी न गड़ाऊँ क्या? बिस्तर पर पड़े-पड़े और करूँ भी क्या?”
“क्या किया जा सकता है? जो नसीब में है, उसे भुगतना ही पड़ेगा।”
इतना कहकर उसने दवा की कटोरी पति के मुँह से लगा दी। उसने मन की कड़वाहट के साथ कड़वी दवा घोंट ली। मुँह और मन दोनों कड़वाहट से भर गए।
पत्नी ने मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना की, “हे ईश्वर! इन दवाइयों का असर जल्दी हो और इनकी तबीयत में सुधार आ जाए, तो मैं आपका यश गाऊँगी।” कुलदेवता का स्मरण करते हुए उसने हाथ जोड़ दिए। इन दिनों वह जहाँ भी जाती, पति के स्वास्थ्य लाभ की मन्नत माँगे बिना नहीं लौटती। अपनी सारी शक्ति लगाकर उनकी सेवा में जुटी थी। मन से थकी नहीं थी, पर हाथ-पाँव टूटने लगे थे।
बाहर बारिश तेज होने लगी थी और उसके मन के भीतर चिंता का बवंडर उठने लगा था। उसने पत्नी से पूछा,
“इस साल जोगवण (खेती में बीज डालने के पहले की गई पूजा) नहीं करेंगे क्या?”
“कौन करेगा? मेरा बाप?”
“किसी को तो करना पड़ेगा न यह काम। औरतें थोड़ी कर सकती हैं!”
“जोगवण-वोगवण छोड़ो। पहले आप ठीक हो जाओ। बाद में करेंगे यह सब।”
“बेटा क्या कह रहा है? इस साल खेत बंजर रखने का इरादा तो नहीं है न उसका?”
“बेटा क्या कहेगा?” पत्नी ने बात को वहीं दबाते हुए कहा।
“क्या हुआ?” उसने खिन्न मन से पूछा।
“घर में अब बेटे की बात कहाँ चलती है।”
“मतलब बहू तैयार नहीं है क्या खेत में जाने के लिए?”
“हमारी तरह मेहनत बच्चे अब नहीं करना चाहते। कहते हैं, खेत में जाने से उनका रंग काला हो जाता है।” पत्नी के मन में उबल रहा क्रोध बाहर आ गया। “हमारे समय में पगडंडियों पर भटके बिना हमें माड़-भात भी नसीब नहीं होता था।”
“पहले के ज़माने में लोगों को धूप नहीं लगती थी क्या? वे काले नहीं होते थे क्या? धूप में काम करके ही हमारी पीढ़ी ने बच्चों का पालन-पोषण किया है।”
“काले हों या गोरे, उससे क्या फर्क पड़ता था? उस समय हम किससे कहते? पेट तो हर हाल में भरना होता था। इन लोगों को सब बैठे-बिठाए मिल रहा है। धूप में कौन जाएगा?”
“बारिश, ठंड और धूप में खपने के दिन गए,” पत्नी ने निराश होकर कहा।
“वह सब तो ठीक है, पर इस साल खेती नहीं करेंगे तो आने वाले दिनों में क्या खाएँगे? पड़ोसियों के भरोसे चूल्हे पर पतीला चढ़ाया जाता है क्या? खेती करेंगे तो कम-से-कम घोटने के लिए माड़-भात तो थाली में पड़ेगा न।”
“सरकार दे रही है न सस्ते दाम पर चावल। और क्या चाहिए? लोग खेती क्यों करेंगे? अब खेती की फिक्र किसी को नहीं है।”
“मतलब, यही न कि पड़ोसियों के भरोसे चूल्हे पर पतीला चढ़ाएँगे अब हम?”
“हमने इन्हीं हाथों से न जाने कितनी ही धान की फसलें काटीं और अब चारों तरफ खेत बंजर होते जा रहे हैं। वे दिन याद आते हैं तो मन छटपटाने लगता है। आज जमीनें खाली पड़ी हैं। मेहनत करके खाने वाला कोई नहीं बचा है।”
“देखना तुम, इस तरह खेती-बाड़ी बंजर कर डालेंगे तो वह दिन दूर नहीं, जब दाने-दाने के लिए मोहताज होंगे सब।”
“हे भगवान! यह दिन देखने से पहले हमें उठा लो।”
“हमारे बुजुर्गों ने अपनी हड्डियाँ गलाकर खेती-बाड़ी सँभालकर रखी, ताकि आने वाले समय में बाल-बच्चों को भूखे पेट न सोना पड़े। भले ही रुपया-आना न जोड़ा हो, पर निरंतर अपने पैर मिट्टी में रोपे रखे और खेती के साथ जुड़े रहे।”
पिता के हाथ-पाँव अब काँपने लगे थे। यह सब देखना उनके लिए बर्दाश्त से बाहर था।
“आजकल के बच्चों को खेती-बाड़ी नहीं करनी है। खेत-खलिहान बेचकर सिर पर हाथ रखे बाहर कमाने जाना चाहते हैं। इस चमचमाती दुनिया को देखकर सबके सब बावले हो रहे हैं। कई दिनों से बारिश हो रही है। अभी तक न देवी-देवताओं का, न सीमा पर बैठे कोतवाल का सम्मान हुआ, न खेत में जोगवण। इस साल कुछ भी नहीं किया है। पता नहीं क्या हुआ है सबको। ये देवी-देवता भी कहाँ उठकर चले गए हैं! रात-बिरात जंगलों में सदा हम इन्हीं के संरक्षण में रहे हैं। जब तक हाथ-पाँव ठीक थे, हमने सारे काम विधि-विधान से किए।”
“आज देवी-देवता, कोतवाल—कोई नहीं है यहाँ। ऊपर भूतबाय का जंगल काटकर वहाँ बहुत बड़ा होटल बनने जा रहा है। सुना है, इन दिनों जोगवणी की जमीन पर का नागदेवता अपनी जगह छोड़कर इधर-उधर घूम रहा है। आज तक नागदेवता कभी बस्ती में नहीं आया था। कल कोई कह रहा था कि परसों दिन के उजाले में नागदेवता बस्ती में दिखाई दिया।”
“वह भी क्या समय था! तीज-त्योहारों के दिन मवेशियों के साथ लकड़ी के लिए जंगल-जंगल घूमते थे। खेतों की पगडंडियों पर किसानों का शोर गूँजता था। सच में, खुशहाली के दिन थे वे। पर आज सब कुछ तितर-बितर हो गया है। वे दिन अब नहीं रहे।”
“अब पुरानी बातों को याद करके क्या फायदा? कोई-न-कोई रास्ता निकालना ही पड़ेगा। अकेली आवाज़ कभी आसमान तक पहुँची है क्या?” पत्नी ने पति को समझाने के लहजे में कहा।
“वह सब ठीक है, पर उन्हें समझाना पड़ेगा। इस तरह मनमानी करने के लिए उन्हें नहीं छोड़ सकते हम। कल को बीज ही नहीं बचेगा तो धान कहाँ से उगेगा? इस बात का अंदाज़ा बच्चों को नहीं है। हमें उन्हें यह बात समझानी होगी। नहीं तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।”
“तुम सही कह रहे हो, पर हम बूढ़ों की बात कौन सुनेगा? यहाँ हमारा बेटा ही हमारी बात नहीं सुन रहा है। गाँव के बच्चे क्या सुनेंगे हमें? हमने तो अपना जीवन जी लिया। इन बच्चों के सामने पूरा जीवन पड़ा है।”
बारिश होते कई दिन हो गए थे। अभी तक न खेतों की सफाई हुई थी, न गोबर की खाद लाकर डाली गई थी और न ही बीज बोने की कोई तैयारी की गई थी। यह सब देखकर बिछौने पर पड़े पिता छटपटा रहे थे। पिछले साल का चावल बचा हुआ था, इसलिए दो वक्त का खाना किसी तरह थाली में आ रहा था।
पिता से रहा नहीं गया। उन्होंने पत्नी को आवाज़ दी।
“क्या इस साल बेटा और बहू खेती करने के लिए तैयार नहीं हैं क्या?”
पत्नी ने कहा, “सुना है, बस्ती के सारे नौजवान कह रहे हैं कि खेती करने के लिए कीचड़ में कौन उतरेगा। अब तो हमारा बेटा-बहू भी मवेशी बेच डालने की बात कर रहे हैं। गाँव के नौजवान शहरों में काम करने के लिए जाना चाहते हैं। उन्हें किसी ने बताया है कि शहरों में अच्छी पगार मिलती है।”
यह सुनकर पिता का मन उदास हो गया। उनकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा।
हे ईश्वर! आजकल के बच्चों पर कौन-सा भूत सवार है? ये सब दो दिन की चाँदनी है। ये बात उन्हें कौन समझाएगा?
“बेटे से कह देना, जब तक मैं ज़िंदा हूँ, मवेशी बेचने नहीं दूँगा।”
“जाने दो इन बातों को। हमारी कौन सुनेगा? अच्छा करेंगे तो अच्छा खाएँगे, नहीं तो मिट्टी खाएँगे।” पत्नी ने धीरज बँधाने का प्रयास करते हुए कहा।
“बड़े-बुजुर्ग ठीक ही कह गए हैं—संकट बस्ती पर आए या घर पर, एक ही समझो।”
“जो होगा, देखा जाएगा। आप सोच-सोचकर अपना जी मत जलाओ,” कहकर पत्नी रसोई में चली गई।
बाप-दादाओं की खेती उनकी आँखों के सामने बंजर पड़ी थी। बाहर जैसे-जैसे बारिश की बौछारें बढ़ रही थीं, पिता अस्वस्थ होते जा रहे थे। मानो हाथ-पाँव गलने लगे हों। उन्हें लग रहा था, उनका अंत समीप है।
वे अपनी स्मृतियों को खँगालने लगे। मवेशी, खेती, मोळनी, पगडंडियाँ, पहाड़ों पर बीता बचपन—अतीत के सारे चलचित्र उनकी आँखों के सामने नाचने लगे। धीरे-धीरे उल्लास और तृप्ति का भाव उनके चेहरे पर उभरने लगा।
“सुनो,” पिता ने पत्नी को पुकारा, “बेटा अंदर पत्नी के साथ ऊँची आवाज़ में क्यों बात कर रहा है?”
“कह रहा है कि किसी ने हमारी बस्ती के लड़कों को विदेश में नौकरी का झाँसा देकर उनके पैसे हजम कर लिए।”
“किसने?”
“यह तो पता नहीं है। लगता है, विदेश की नौकरी की आस दिखाकर किसी ने इस बार की फसल के पैसे चट कर लिए।”
“मोर नाच रहा है, यह देखकर ततैये को नहीं नाचना चाहिए।”
एकाएक भीतर के माले से आवाज़ आई, जैसे कोई सामान निकाल रहा हो। कुछ देर बाद आँगन से आती खट-खट की आवाज़ पिता के कानों में पड़ने लगी।
पिता को लगा, उनके थके-हारे मन को कोई आवाज़ दे रहा है। वे चुपचाप बिछौने पर पड़े रहना चाहते थे, पर आँगन से आती खट-खट की आवाज़ उन्हें बेचैन कर रही थी।
उन्होंने पत्नी को आवाज़ लगाई, “देखो ज़रा, आँगन में कौन है?”
“रुको, आती हूँ।”
कुछ देर बाद पत्नी की आवाज़ आई, “बेटा माले से हल, जुआढ़, पाटा, फाड़ और मुठिया निकालकर आँगन में हल जोड़ने बैठा है।”
यह सुनते ही बिछौने पर पड़े पिता की आँखों के सामने जोगवण, हल, बैलों का जोड़ा, बरहा—एक-एक कर उभरने लगे। जैसे-जैसे हल जोड़ने की खट-खट बढ़ती जा रही थी, पिता के मन में उम्मीद की एक किरण जन्म ले रही थी।
वे धीरे से उठकर बैठ गए और पास रखे पानी के लोटे की ओर अपना थरथराता हुआ हाथ बढ़ा दिया।
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मूल कहानीकार का परिचय
नाम: नरेश चंद्रकांत नायक
जन्म: पासल, अर्दफोंड, काणकोण, गोवा।
कार्य: गोवा विद्यापीठ में कोंकणी भाषा के सहयोगी प्राध्यापक के पद पर कार्यरत।
साहित्यिक विधाएँ: कहानी, कविता, निबंध एवं आलोचना।
हिंदी, कन्नड़ और अंग्रेज़ी भाषाओं में कहानियों का अनुवाद हुआ है।
पुरस्कार एवं सम्मान:
2014 में साहित्य अकादेमी का युवा साहित्य पुरस्कार।
माधवी सरदेसाय युवा शिक्षक पुरस्कार।
साहित्य सम्मेलन का युवा साहित्य पुरस्कार।
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सरिता सैल
अनुवादक का परिचय
नाम: सरिता सैल
जन्म: 10 जुलाई।
शिक्षा: एम.ए. (हिंदी साहित्य)।
सम्प्रति: कारवार, कर्नाटक के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में अध्यापन।
मेरे लिए साहित्य मानव जीवन की विवशताओं को प्रकट करने का माध्यम है।
कोंकणी, मराठी, असमिया, पंजाबी एवं अंग्रेज़ी भाषाओं में कविताएँ अनूदित हुई हैं।
भारतीय शिक्षा बोर्ड अक्षरा के हिंदी पाठ्यक्रम में कक्षा पाँच की पुस्तक में कोंकणी भाषा से हिंदी में अनूदित कहानी ‘नारियल का पौधा’ शामिल है।
कई नामी मंचों से ऑनलाइन काव्यपाठ।
प्रकाशन: मधुमती, सृजन सरोकार, इरावत, सरस्वती सुमन, मशाल, बहुमत, मृदंग, वीणा, संपर्क भाषा भारती, नया साहित्य, निबंध और दैनिक भास्कर, हिमप्रस्त आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ एवं अनूदित कहानियाँ प्रकाशित।
कविता-संग्रह:
कावेरी एवं अन्य कविताएँ।
दर्ज होते ज़ख्म।
अनुवाद: कोंकणी भाषा से हिंदी में ‘चाक’ नाम से उपन्यास का अनुवाद।
साझा संग्रह: कारवाँ, हिमतरू, प्रभाती, शतदल में कविताएँ शामिल।
अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें।
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