वर्ग-लोकतंत्र का भंडाफोड़ : लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ के सबक
– वंदना

राज्य, सत्ता और क्रांति जैसे सवालों पर राजनीतिक-दार्शनिकों के अनेक विचार आते रहे हैं, लेकिन यहाँ भी बात वहीं थम कर रह जाती है, यानी इतिहास की व्याख्या भर करके दार्शनिक विचार-विमर्श चलता रहता है. मार्क्स-एंगेल्स ने राज्य को वर्ग-संघर्ष की उपज बताया, लेकिन उनके सिद्धांतों को लाग-लपेटकर कुंद करने की कवायद मार्क्सवादी ख़ेमे के ही प्रखर (?) विचारकों ने किया. ऐसे ही अवसरवादियों का पर्दाफ़ाश करने के लिए लेनिन ने 1917 में ‘राज्य और क्रांति’ लिखकर आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में क्रांतिकारी हस्तक्षेप किया. यह वह समय था जब रूस में युद्ध, भूख, आर्थिक संकट और जनता के असंतोष ने राजनीतिक व्यवस्था को हिला दिया था. इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लेनिन ने राज्य की प्रकृति, उसकी वर्गीय भूमिका और क्रांति की अनिवार्यता पर ‘राज्य और क्रांति’ लिखकर न केवल मार्क्सवाद के मूल सिद्धांत को सक्रियता दी, बल्कि अवसरवादियों का भंडाफोड़ किया और अराजकतावादियों को जवाब दिया.
राज्य कोई दैवीय या प्राकृतिक संस्था नहीं है जिसे समाज ने स्वेच्छा से चुना हो. इसका जन्म तब हुआ जब समाज वर्गों में विभाजित हुआ और निजी संपत्ति का उदय हुआ. इस विभाजन ने अमीर-गरीब, मालिक–गुलाम जैसे विरोधी हितों वाले वर्गों को जन्म दिया. जब इन वर्गों के टकराव असहनीय हो गए, इस टकराव को नियंत्रित करने के लिए राज्य अस्तित्व में आया. राज्य निष्पक्षता का नहीं, बल्कि शासक वर्ग के हितों की रक्षा का तंत्र है.
आज, एक सदी बाद वित्त-पूँजी, राज्य-निगरानी के डिजिटल औज़ार और हिंसक राष्ट्रवाद के दौर में राज्य की ताक़त बेतरह बढ़ी है; वह चाहे डेटा पर नियंत्रण हो, कॉर्पोरेट पूँजी के साथ गठजोड़ हो, चुनाव हो या जन-आंदोलनों पर दमन. ऐसे में लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ राज्य की प्रकृति को समझने और लोकतंत्र व न्याय के जटिल प्रश्नों को उठाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. उन कथित मार्क्सवादियों के लिए एक ज़रूरी किताब, जो ‘रणनीति और कार्यनीति’ के नाम पर ज्यादातर चुनावी गठजोड़ में लिप्त हैं और अक्टूबर क्रांति व पेरिस कम्यून के सबकों को ही झुठला चुके हैं.
शुरुआत में ही लेनिन लिखते हैं कि “उत्पीड़क वर्गों ने महान क्रांतिकारियों को उनके जीवन भर लगातार यातनाएं दीं, उनकी शिक्षा का अधिक-से-अधिक बर्बर द्वेष, अधिक-से-अधिक क्रोधोन्मत्त घृणा तथा झूठ बोलने व बदनाम करने के अधिक-से-अधिक अंधाधुंध मुहिम द्वारा स्वागत किया. उनकी मौत के बाद उनकी क्रांतिकारी शिक्षा को सारहीन करके, उसकी क्रांतिकारी धार को कुंद करके, उसे भ्रष्ट करके उत्पीड़ित वर्गों को बहलाने तथा धोखा देने के लिए उन्हें अहानिकर देव प्रतिमाओं का रूप देने, यों कहें, उन्हें देवत्व प्रदान करने और उनके नामों को निश्चित गौरव प्रदान करने के प्रयत्न किये जाते हैं.” (संकलित रचनाएँ, व्ला. इ. लेनिन, खंड-7, पृ. 21)

चूँकि अवसरवाद का यह सारा खेल मार्क्स-एंगेल्स के नाम पर ही होता है, यानी सन्दर्भहीन ढंग से उनके लेखन को उद्धृत करके होता है, इसलिए लेनिन ने मार्क्स-एंगेल्स के तमाम उद्धरणों से ही अवसरवादियों का पर्दाफ़ाश किया है. अपने समय में मार्क्स-एंगेल्स ने भी विचारहीनता और दर्शन-विपन्नता का पर्दाफ़ाश करना ज़रूरी कार्यभार समझा था. मज़दूरों में बेहद लोकप्रिय और प्रखर सिद्धांतकार माने जाने वाले प्रूधों ने जब ‘निर्धनता का दर्शन’ लिखा तो मार्क्स ने तार्किक ढंग से ‘दर्शन की निर्धनता’ लिखकर प्रूधों के भाववाद का ख़ुलासा किया और मज़दूर राजनीति को विभ्रम से बचाया. जनाब ड्यूरिंग की आलोचना लिखने में एंगेल्स को चाहे जितनी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन उन्होंने कार्यभार के तहत ‘ड्यूरिंग मत-खंडन’ जैसी बेहतरीन सैद्धांतिक किताब लिखी. 20वीं सदी में यही काम लेनिन ने उन लोगों के ख़िलाफ़ किया जो कथित तौर पर मार्क्सवादी कहे जाते थे. एंगेल्स की टिप्पणी से वे यह बात शुरू करते हैं कि राज्य की पहचान जनता से अलग एक विशेष सार्वजनिक शक्ति के रूप में होती है, जिसमें सेना और पुलिस को शोषितों, मजदूर-मेहनतकशों और किसानों को नियंत्रण में रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. राज्य एक विस्तृत नौकरशाही तंत्र खड़ा करता है, जो शासक वर्ग के प्रभुत्व को उसके अनुरूप चलाने में मदद करता है. सेना, पुलिस, जेलें और नौकरशाही वह दमनकारी राज्य-तंत्र हैं, जो वर्ग-संघर्ष को दबाकर अपनी व्यवस्था बनाए रखते हैं.
किसान आंदोलन के दौरान पुलिस ने किसानों पर कौन-से दमन नहीं किए! मारूति और बोल्सोनिका मज़दूरों के संघर्षों पर पुलिस का दमन तो बुर्जुआ संविधान से भी परे चला गया. विद्यार्थियों-युवाओं और अल्पसंख्यकों के तमाम संवैधानिक हकों की लड़ाइयां जिस तरह बंदूक के बल पर दबाई गईं; क्या यह मात्र सरकार बदलने से ठीक हो सकती हैं? अभी-अभी पारित चार श्रम-कानून ही देख लें. मज़दूर की परिभाषा बदलकर,मज़दूरों को उनके बुनियादी हकों से वंचित करके यूनियन का ख़ात्मा कर दिया गया है. अब हड़ताल असम्भव और प्रतिरोध गैर-क़ानूनी है.
वित्त पूंजी के वैश्विक प्रसार के बावजूद क्या आपको लगता है कि कोई भी सरकार पूंजीपतियों से लोहा ले सकेगी? ताज़ा उदाहरण न्यूयॉर्क सिटी के नए मेयर ममदानी हैं जिन्होंने चार-पांच बुनियादी एजेंडे के आधार पर जनता को एकजुट तो किया, लेकिन वे इतनी मामूली चीज़ को भी पूंजीपतियों के आपसी टकराहट के बीच कुछ टैक्स वगैरह लगाकर भी शायद ही पूरा कर पाएं. आख़िरकार जिनके ख़िलाफ़ वे खड़े हुए उन्हीं के धड़े में उन्हें आना होगा. हम देख रहे हैं कि लोग-बाग इतने संकट में हैं कि वे बुनियादी हकूक, जिन्हें 1917 की ‘अक्टूबर क्रांति’ के दौरान ही प्राप्त कर लिया गया था, उसके लिए भी आज दर-बदर हो गए हैं. आज उन्हीं हकों का थोड़ा-सा हिस्सा पाने की बात करने पर भी सोशल डेमोक्रेट ममदानी कम्युनिस्ट कहे जा रहे हैं. नागार्जुन ने सच ही लिखा है-
“रोज़ी-रोटी हक़ की बातें, जो भी मुंह पर लाएगा
कोई भी हो, निश्चय ही वह, कम्युनिस्ट कहलायेगा।”
राज्य और सरकार में अंतर ना समझने वाले लोगों को ठोस तौर पर यह जानना होगा कि पूंजी के गठजोड़ के साथ राज्य की ताक़त इतनी बढ़ चुकी है कि पुलिस बुर्जुआ संवैधानिक आदेशों की धज्जियाँ उड़ाकर भी पूंजीपतियों के लिए प्रतिबद्ध है. तो आख़िरकार यह किसका राष्ट्र, किसकी सरकार और किसका राज्य है?
दरअसल मज़दूर वर्ग अपनी मुक्ति मौजूदा राज्य मशीनरी के द्वारा पा ही नहीं सकता. यह मशीनरी, जिसे शासक वर्ग ने अपने हितों के लिए बनाया है, मजदूर वर्ग के हित में काम नहीं कर सकती है. इसलिए क्रांति का अर्थ केवल सरकार बदलना नहीं है, बल्कि पुरानी राज्य मशीनरी याने सेना, पुलिस, नौकरशाही और अदालतों आदि को किनारे करना है. लेकिन केवल इससे काम नहीं चल सकता. पुरानी मशीनरी को ध्वस्त करने के बाद मज़दूर को अपनी सत्ता की रक्षा और पूंजीपति वर्ग के प्रतिरोध को कुचलने के लिए एक नई मशीनरी का निर्माण भी करना होगा. इसे ही सर्वहारा वर्ग की तानाशाही कहा जाता है; एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें पहली बार बहुसंख्यक मज़दूर और किसान सत्ता में होते हैं और अल्पसंख्यक शोषक वर्ग को दबाया जाता है. सर्वहारा की इसी तानाशाही से प्रतिक्रियावादी तो छोड़िए, सबसे ज़्यादा सामाजिक-जनवादी और प्रगतिशील लोग डरते हैं और अपनी सुविधा के लिए एक क़िस्म का डर बनाकर इतिहास में अलग-अलग ढंग से फ़ासीवादियों के लिए रास्ता तैयार करते हैं.
पूंजीवादी लोकतंत्र वास्तव में ख़ुद मुट्ठी भर पूंजीपतियों की तानाशाही है, जो ग़रीबों और मज़दूरों पर चलती है. यह धन, मीडिया और कानूनी तंत्र की आड़ में छिपी रहती है, जबकि इसके उलट, सर्वहारा की तानाशाही असल में बहुसंख्यक मज़दूरों और किसानों की सत्ता है या कहें होगी. शोषकों की आर्थिक व सांस्कृतिक जड़ें उनके अंतर्राष्ट्रीय संबंधों व आदतों के कारण इतनी गहरी हैं कि एक समय तक उन्हें दबाए रखना सर्वहारा का काम है. लेकिन यह दुनिया बहुसंख्य शोषितों के लिए अभूतपूर्व लोकतंत्र है. सर्वहारा की तानाशाही संक्रमण काल है. इसका लक्ष्य निजी संपत्ति को ख़त्म कर समाजवादी ढाँचे की ओर जाना है. क्या कथित मार्क्सवादी यह बात भूल गए? नहीं, उन्होंने स्पष्टतः अवसरवाद और अराजकतावादी रास्ता ले लिया है. सेकेंड इंटरनेशनल के ‘सूरमाओं’ की तरह आज मार्क्सवादी जो संसदों के सदस्य बन गए हैं, ट्रेड-यूनियनों के बड़े अधिकारी बन गए हैं, उन्हें अब क्रांति का रास्ता ‘हिंसक’ लगने लगा है. उनका यह कहना सर्वहारा से सरासर धोखेबाज़ी और मार्क्सवाद-लेनिनवाद से गद्दारी है कि राज्य वर्ग-दमन का उपकरण नहीं है, बल्कि वह तो वर्गों के बीच सुलह कराने वाली संस्था है! और लोकतंत्र के विकास के साथ राज्य धीरे-धीरे निष्पक्ष होता जायेगा और मज़दूर वर्ग चुनाव जीतकर, संसद में बहुमत हासिल करके शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता में आ सकता है. इस तरह मज़दूर-वर्ग इसी मशीनरी से समाजवाद ला सकता है. यह तो पेरिस कम्यून की सीखों से ही धोखेबाज़ी है और अक्टूबर क्रांति के सबसे क्रांतिकारी तत्व को ही निकाल बाहर करना है. मज़दूरों को यह दिलासा देकर कि उन्हें अब क्रांति की ज़रूरत नहीं है, समूचे आंदोलन की दिशा ही बदल देना है. यही नहीं, फ़ासीवादियों के लिए रास्ता तैयार करना भी है. इन्हीं नीतियों के कारण आज मज़दूर निहत्थे होकर पूंजीपतियों के हवाले हो गए हैं. ज़ाहिर है कि ऐसे मार्क्सवादियों के लिए सर्वहारा की तानाशाही ‘अलोकतांत्रिक’ हो गई और ‘लोकतंत्र’ का झुनझुना संसदीय राजनीति का अस्त्र बन गया है. गोरख पाण्डेय ने इस संबंध में मारक पंक्तियां लिखी हैं-
“समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई
नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई..
कांग्रेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई .. ”
1871 का 72 दिनों तक चला महान पेरिस कम्यून मज़दूरों के शासन की पहली ऐतिहासिक नज़ीर है जिससे कुछ ज़रूरी सबक निकले थे, जैसे-कम्यून ने स्थाई सेना को ख़त्म कर सशस्त्र जनता की अवधारणा को अपनाया था. पुलिस को राजनीतिक शक्ति से वंचित कर दिया गया और उसे जनता के प्रति जवाबदेह बनाया गया, साथ ही किसी भी समय उसे हटाने की शक्ति जनता के पास सुरक्षित की गई. सभी अधिकारी, चाहे वे जज हों या सरकारी कर्मचारी, जनता द्वारा चुने जाते थे और ज़रूरत पड़ने पर वापस बुलाए जा सकते थे. कम्यून में किसी भी अधिकारी का वेतन एक कुशल मज़दूर से अधिक नहीं था, जिससे विशेषाधिकार और भ्रष्टाचार ख़त्म हुए. कम्यून एक कार्यकारी संस्था थी, जो कानून भी बनाती थी और उन्हें लागू भी करती थी. आज की तरह सिर्फ़ बहस करने वाली संसद नहीं थी. ये सभी सिद्धांत मज़दूर शासन की वास्तविक संरचना के उदाहरण थे. लेकिन हम देख रहे हैं कि किस तरह इतिहास के ये ज़रूरी सबक हमारी आँखों से ओझल कर दिए गए हैं. यही कारण है कि तत्कालीन अवसरवादियों के ख़िलाफ़ लेनिन ने पेरिस-कम्यून का उदाहरण रखा था.
लेनिन ने अराजकतावाद पर भी प्रहार किया है, जो हर तरह के बहुमत को तानाशाही मानते हैं. वे अल्पसंख्यक-बहुसंख्य की समझ के अभाव में अल्पसंख्यकों के बहुमत पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं. लोकतंत्र की उनकी समझ यह है कि वे मज़दूर तानाशाही तो छोड़िए, किसी तरह का राज्य भी नहीं चाहते. उनका कहना था कि समाजवाद के साथ ही समाज राज्यविहीन हो जाना चाहिए. लेनिन इसे अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक बताते हुए कहते हैं कि अराजकतावाद अंततः पूंजीपतियों को ही फ़ायदा पहुंचाता है, क्योंकि राज्यविहीनता पूंजीवाद की वापसी का रास्ता खोल देती है. अराजकतावादी यह नहीं समझते कि क्रांति एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जो बिना संगठन, अनुशासन और वर्ग-संघर्ष के नहीं होती.
राज्य और क्रांति’ का एक मुख्य भाग राज्य के विलोप याने Withering Away है. ऐतिहासिक द्वंद्ववाद यह बताता है कि पूंजीवादी राज्य क्रांति से समाप्त होगा, जबकि समाजवाद के बाद साम्यवाद की दिशा में राज्य मुर्झाकर विलोपित हो जायेगा. जीवन, तकनीक और समाज इतना विकसित हो जायेगा कि राज्य की प्रासंगिकता समाप्त होते चले जाने से वह शासन की बजाय प्रबंधन तक सीमित होता जायेगा. लेकिन अवसरवादियों ने यह प्रक्रिया ही उलट दी. उन्होंने राज्य विलोपन की प्रक्रिया पूंजीवाद और समाजवाद के बीच ही लागू कर रखी है. इस बौद्धिक बेईमानी पर करारा जवाब देना लेनिन के लिए ज़रूरी था. वैज्ञानिक समाजवाद अपने क्रांतिकारी पक्ष के साथ दुनिया को बदलने की भूमिका में सतत खड़ा रहा. अवसरवादियों ने क्रांति की अनिवार्यता, सर्वहारा की तानाशाही और राज्य के मुरझाने जैसे मूल सिद्धांतों को कमज़ोर कर दिया. लेनिन ने ‘राज्य और क्रांति’ लिखकर इन सभी विकृतियों का खंडन किया और मूल मार्क्सवादी सिद्धांतों की पुन: स्थापना की.
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वन्दना चौबे
कवि और आलोचक
नया ज्ञानोदय, वागर्थ, आलोचना, तद्भव, प्रगतिशील वसुधा, कृति बहुमत, बनास जन, संबोधन, हिंदी समय, वर्तमान साहित्य और समकालीन जनमत जैसी अनेक पत्रिकाओं में समय समय पर कविता और लेख आदि प्रकाशित। देश भर के तमाम मंचों पर साहित्यिक, सामाजिक, जनवादी और प्रगतिशील चिंतन पर व्याख्यान।
मार्क्सवादी चिंतन दृष्टिकोण तथा प्रगतिशील लेखक संघ से संबद्धता।

संप्रति बनारस के आर्य महिला पी.जी. कॉलेज (BHU) में सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत।
[9532773542]
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