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Home कविता

ललन चतुर्वेदी के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘आवाज घर’ से सात कविताएँ

by Anhadkolkata
March 26, 2026
in कविता
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ललन चतुर्वेदी की कविताओं की सहजता एवं संवेदनशीलता तो आकर्षित करती ही है, उन कविताओं के विषय भी कम  मानीखेज नहीं है। ललन जी अपनी कविताओं में इस दुनिया के बदलते जाने की एक शांत और मार्मिक कथा कहते हैं। सभ्यता और व्यवस्था में छटपटाता आदमी जब अपनी बेचैनी को शब्दों में बाँधता है तब इस तरह की कविताएँ पैदा होती हैं।

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ललन चतुर्वेदी मेरे प्रिय कवि हैं एवं सदैव ही उन्होंने अनहद को रचनात्मक सहयोग प्रदान किया है। साथ ही वे अनहद की संपादीय टीम के भी सदस्य हैं।
बहरहाल ये कविताएँ बहुत पहले भेजी गई थीं जब उनका संग्रह आवाजघर छपकर आया था लेकिन कवि का हर संग्रह नया ही होता है, होना भी चाहिए और ललन जी का यह संग्रह अपनी कहन और कलेवर में सदैव नया है।

यहाँ प्रस्तुत है उनके उसी नए संग्रह से चुनी हुई सात कविताएँ।

आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार तो रहेगा ही।

  • संपादक

 

ललन चतुर्वेदी

कुरसी

एक मामूली सा किरानी क्रेन बन जाता है
हमारे वजूद को अंकुश में फँसाकर घंटों तक लहराता रहता है हवा में
नाम के हिज्जे ठीक से लिख नहीं पाता
और उसे सही करने के लिए माँगता है जन्म से लेकर बुढ़ापे तक के सारे कागजात
सामने बैठे शख्स से माँग सकता  है जीवन या मृत्यु प्रमाण पत्र

सिस्टम में वही कामयाब है जो संतरी से लेकर मंत्री तक को सुबह-शाम मारता है सैल्यूट

अपना ही रुपया निकालने गये आदमी को
डाँटने लगता है कैशियर-कम-क्लर्क –
काउंटर से बाहर निकालो हाथ

किससे कोई करे शिकायत
और सुनने वाला भी कोई तो हो

कुरसी पर बैठा आदमी तय करता है व्याकरण के सारे नियम
वह बदल सकता है लिंग
वह कर सकता है संधि-विच्छेद

भूलकर भी मत करना ऐसे गुणियों -ज्ञानियों से मतभेद
इनमें दम है कि अगले जनम तक पीछा करेंगे
मृतकों के परिजनों को भी जिंदा नहीं छोड़ेंगे
जिनके हाथों में तुम्हारा फाइल है
वे तुम्हारे वजूद को भी फाइल कर देंगे
और एक दिन दफ़न कर देंगे तुम्हें फाइलों में ही।

 

नग्न होने की प्रतीक्षा में

हम सब कीमती लिबास में ढँके नग्न लोग हैं
हम से बेहतर कौन जानता है हमारा नंगापन
जिसे बताते नहीं थकते अपना चंगापन

नग्न होते हुए निश्छल हँसी हँसता है बच्चा
उसे कहाँ परवाह है अपने नंगेपन की?

कितना डरते हैं हम नग्न होने से
हम सब भयभीत हैं एक दूसरे से
जीवन सुबह से शाम तक छिपने और छिपाने का  जतन  है

बेशकीमती कपड़े, आभूषणों और शहद सिंचित बोलियों के बावजूद

कहाँ कुछ छिप पाता है?
दबी जुबान से ही सही,होती रहती है एक दूसरे के  नंगेपन की चटकदार चर्चा
एक घिनौनी हँसी  छितराती रहती है हवा में  हरदम

काश ,हम नंगे हो जाते
सबकी बोलती हो जाती बंद
नंगेपन की चर्चा पर लग जाता पूर्ण विराम

सभ्यताओं में कहाँ है नग्न होने की हिम्मत
नंगा होना साहस का काम है साहब !

हम नग्न होते हुए बहुत हलके हो जाते हैं तन से और मन से भी
हम बन जाते हैं शिशु और हो जाते हैं बेपरवाह
हमें सीखना होगा नग्न होने का गुर

अभी हम नहीं बन पाए हैं सभ्य और निश्छल
हम कब जुटायेंगे नग्न होने का साहस
दुनिया उस दिन की कबसे प्रतीक्षा कर रही है।

 

प्रतीक्षा सीखता हूँ किसान से

अधीर लोगों से मिलने की इच्छा जाती रही
हमारे समय के विद्वान आतंकित करते हैं
लगता है कि वे दुनिया को बदलने तक जारी रखेंगे अपना भाषण
आँखें मूँद लेता हूँ इन नेताओं को देख कर

जब भी मन उदास होता है
चला जाता हूँ प्रेमियों के पास
वे झूमते रहते हैं उदासी की खुशी में

जब हावी होने लगती है निराशा
भागता हूँ खेत से लौटते किसानों के पास
वह अभी-अभी लौट रहा है जमीन में  डालकर बीज
हफ्ते भर वह खेतों की ओर नहीं जाएगा
वह लौट रहा है प्रतीक्षा बोकर
महीनों वह धैर्यपूर्वक लहलहाती बालियों का करेगा इंतजार
आकाश की ओर ताकते हुए बादलों की प्रतीक्षा करेगा

बारिश के अभाव में यदि फसलें नहीं हुईं
वह प्रतीक्षा करेगा अगले साल तक
अधीर कभी नहीं होगा
बचाए रखेगा मन के किसी कोने में आशा का बीज
मैं किसानों से मिलकर उम्मीदों का मुट्ठी भर बीज माँगने जा रहा हूँ
मैं उन्हें अपनी कविताओं में बोऊँगा।

 

एक सी आग लगी है पूरी दुनिया में

जितनी बूँदें गिरतीं हैं पसीने की
उससे भी कम रक्त दौड़ता है शिराओं में
सबके रक्त एक सदृश नहीं हैं
यह घिनौना सच है

एक देश सहला रहा है  दूसरे देश का तलवा
अब भी अनगिनत गर्दनें पाँवों के नीचे दबी हैं
बहुत उम्दा और नामचीन संस्थान मात्र दिखावे के बैनर हैं
दया,करूणा के प्रचारकर्ता केवल प्रसाद बाँटते हैं
उनसे कहाँ मिटती है भूख ?

बेतहाशा लोग भाग रहे हैं सरहदों को लाँघकर
ये सीमा रेखाएँ जो धरती पर खींच रखी है शासकों ने
इंसानों को बंदी बनाने के षड्यंत्र  हैं
सुरक्षा के लिए कारागार – मूर्खों की इजाद है
जहाँ खड़ा हो जाए अस्तित्व पर संकट
वहाँ कौन रूकना चाहेगा ?

कुछ बातें, कुछ नियम कागजों को सुशोभित करने के लिए हैं सूक्तियों की तरह
ये संकट में उच्चारे जाते हैं मंत्रों की तरह
ये वही मंत्र हैं जो पढ़े जाते हैं राज्याभिषेक के पहले पुरोवाक् की तरह
सत्तासन पर बैठा सिंह जंगल की रक्षा नहीं करता
एक-एक कर सबको ग्रास बनाता है

जो भगदड़ मची है इस दुनिया में वह बिल्कुल बेआवाज है
इसे सुनने के लिए लगाना पड़ेगा कान
कौन यह जहमत उठाए ?
कितना मधुर संगीत बज रहा है !
कौन उठे इस महफिल को छोड़कर ?

सबका अपना-अपना भाग्य है –
यह धर्मोपदेशक बक रहा है
पाँचों पकवान भोग लगाने के बाद

इस मरूभूमि में बिल्ली की जान बची हुई है
कौन देता होगा इन्हें चारा- पानी ?
वह दबे पाँव पीछे – पीछे आ रही है उदासी की तरह
मैं लिफ्ट में सवार हो सीधे पहुँच गया हूँ वातानुकूलित कक्ष में
यह सोचते हुए नींद नहीं आ रही  कि बिल्ली लौटकर कहाँ ग‌ई होगी ?

एक सी आग लगी हुई है पूरी दुनिया में सदियों से
अनगिनत लोग  इसकी चपेट में भाग रहे हैं इधर- उधर
पसीने की बूँदों से यह आग कभी बुझ पाएगी?
 

शिकारियों के लिए यह जश्न की रात है

मैं कहाँ से लाऊँ कविताओं में लय या छंद
संगीत तो और भी पीछे छूट चुका है
सब तरफ उदास चेहरों का जमावड़ा है
हँसते हुए लोगों को देखकर करूणा उमड़ती है
रोशनी के पीछे घनघोर अंधकार पसरा है
राग के भीतर उमड़ रही है रुलाई
कहाँ बचा है शब्दों में अर्थ
पर्याय ढूँढने से नहीं मिलते
उच्चरित होते ही शब्द बदल जाते  हैं विलोम में
चीजें साक्ष्य की मोहताज हो गई हैं
अस्तित्व संघर्ष का मुखापेक्षी हो गया है

जबकि जीवन पटरी से उतर चुका है
बात कितनी बेतुकी है गति या प्रगति की
सब कुछ स्थगित है तालाब के थिर जल सा
अमूमन प्रदूषण से ही मर रहीं हैं मछलियाँ
उधर जाल भी फेंके जा रहे हैं लगातार
ऐसे में पानी से प्रीत  निभे तो कैसे
शिकारियों के लिए यह जश्न की रात है
आख़िरी साँस लेती हुईं सोच रहीं हैं मछलियाँ –
बेबस की मौत पर मातम  कौन मनाता है?

 

इलाहाबाद से प्रयागराज  

पहले कहाँ था किसी का कोई नाम
न देश का,न शहर का न गाँव का
हमीं ने तो कहा – यह भारत है,वह ईरान
हमीं ने तो कहा-यह दिल्ली है,वह दौलताबाद
हमीं ने पक्षियों को देखकर कहा –
यह कोयल है और वह  कौवा
जानवरों को कहा-यह शेर है,वह सियार
कुत्ते को भी कहाँ मालूम था कि वह कुत्ता ही है

हमने ही कहा कि यह राम है और वह रहीम
हमने ही कहा कि यह हिन्दू है वह मुसलमान

हमने सारी चीजों को नाम दिए
इस तरह एक नाम दूसरे के लिए बदनाम हुए
इस बँटवारे में हम सब शामिल थे
कुछ लोग गर्व से झूम रहे थे
तो कुछ लोग चुप थे सिर झुकाए

समय बदला पर फितरत कहाँ बदली
कल का  कल्लू आज का  कलाकार
परसों  घोषित हो सकता है कलंदर
अब  हर पाँच साल बाद
बदलती रहेंगी बच्चों की पोथियाँ

बड़े मजेदार हैं यहाँ के लोग
मूर्खों को बुलाते हैं विद्वान
दुष्टों को कहते हैं महान
मुखिया जी बने हैं गाड़ीवान
जैसे ही कोई पहनता है खद्दर
बोलने लगते हैं उसे विधायक धाकड़

एक समझौते के तहत पाँच साल तक
दोस्त को कहेंगे दुश्मन
फिर उसके बाद दुश्मन को पुकारेंगे दोस्त
कह सकते हैं मगहर को काशी
या काशी को मगहर
नहीं है कोई अगर- मगर

मुझे कहाँ मालूम था
इलाहाबाद से निकल कर  पहुँच जायेंगे प्रयागराज में
कल यह भी हो सकता है प्रयागराज से निकलूँ
और पहुँच जाऊँ इलाहाबाद में।

 

काल के कपाल की अबूझ लिपियाँ

कितनी हलचलें दर्ज हो रही हैं लगातार
कुछ स्मृतियों में धँस चुकी हैं कील की तरह
जिनमें जंग लगने की गुंजाइश नहीं हैं जीवन पर्यन्त

हवा समय-समय पर  राख में छिपी आग को भड़का देती है
दिखता है सब कुछ जलता हुआ धुआँ-धुआँ
यहाँ तो सन्नाटा पसरा है अन्तश्चेतना पर
और तुम पूछते हो क्या हुआ ?

बिकाऊ –फेंकाऊँ चीजों के दिनों में
जरूरी सवालों से कतराने लगे हैं लोग
दर्द की भी कोई मियाद होती है क्या
असमंजस में पड़ा मन बार- बार पूछता है

अनेक हृदयद्रावक घटनाएँ दफ़न हो जाती हैं विस्मृति के गर्भ में
जैसे जीभ भूल जाती है पाँच-दस मिनट में चाय का स्वाद

समय लगातार लिख रहा है अबूझ लिपियों में

एक साथ जय- पराजय की अनेक कथाएँ
किसकी जय और किसकी पराजय ?
हम अपनी ही व्यथाओं में व्यस्त लोग
इनसे हैं बेखबर, लापरवाह
इन्हें पढ़ने की कोशिशें करने वाले भी
क्यों हो रहे  हैं लगातार नाकाम ?

एक चमकदार विज्ञापन
क्षण भर में कर देता है सुर्ख़ियों को विस्थापित
बहुत गझिन है यह भ्रम जाल
हम समाते जा रहे हैं एक अंतहीन सुरंग में
कैसा कोहरा है कि सूझ नहीं रहा हाथ को हाथ
यहाँ पास में बैठे आदमी का चेहरा भी अपठनीय है

असत्य भी पूरे गर्व के साथ हो सकता है  विराजमान
तस्दीक कर रहे हैं चौराहे पर चस्पां  विज्ञापन

***

 

संक्षिप्त आत्मवृत्त

ललन चतुर्वेदी (मूल नाम-ललन कुमार चौबे)

वास्तविक जन्म तिथि : 10 मई, 1966

मुजफ्फरपुर(बिहार) के पश्चिमी इलाके में

नारायणी नदी के तट पर स्थित बैजलपुर ग्राम में

शिक्षा: एम.ए.(हिन्दी), बी एड.,विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण

प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर , बुद्धिजीवी और गधे (दो व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी , यह देवताओं का सोने का समय है एवं आवाज घर (तीन कविता संग्रह) तथा साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित।

 

 

संपर्क:

ललन चतुर्वेदी

202,असीमलता अपार्टमेंट

मानसरोवर एन्क्लेव,हटिया

रांची-834003

मोबाइल न. 9431582801

ईमेल: lalancsb@gmail.com

 

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अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

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