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Home कविता

नीरज चड्ढा की कविताएं

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in कविता, साहित्य
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7
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नीरज चड्ढा

नीरज चड्ढा एक ऐसे मित्र रहे हैं जिन्हें मैं एक गंभीर अध्येता और वैज्ञानिक के रूप में जानता था। कई बार मंच से जब वे बोलते थे तो ऐसी कविताएं उद्धृत करते थे जो मेरे लिए बिल्कुल नई होती थीं। बाद में पूछने पर उन्होंने बताया कि वे कविताए दरअसल उनकी ही होती थीं। बहरहाल आज 23 जून उनका जन्मदिन है। आज अनहद पर उनकी एकदम ताजी कविताएं प्रस्तुत हैं। आप अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें जरूर अवगत कराएं।

(एक)
काला धन
सभी काले
भ्रष्टाचार के धुँए में
—————–
मैं प्रधान
सब देखता हूँ
धृतराष्ट्र की तरह
—————–
एक योगी
बहुत उठा
चने की झाड़ पर
—————–
देश की लाज
लुट रही है
तमाशा अच्छा है 
(दो)
 कुछ पन्ने सम्हाले हैं बड़े जतन से, 
सुनहरे से, लाल, हरे, पीले,
जाने क्या-क्या लिखा, अनचाहे-अनजाने,
अब टटोलता हूँ हर एक हर्फ,
बचाकर, कहीं खो न जाय …..
सम्हाल कर रखी हैं छोटी-छोटी बातें,
कुनमुनाते-चुहचुहाते चूजों की तरह,
कभी आना, दिखाऊँगा,
कैसे सहेजते हैं यादें,
तिनका-तिनका कर बने घोंसले की तरह ..
(तीन)
एक बात पूछूँ ?…..

तुम हो क्या वहाँ ? बढ़ कर छू लूँ तुम्हें ?
नाराज हो ? आकर मना लूँ तुम्हें ?
याद करती हो मुझे, कभी पलकें बन्द करके ?
कुछ कहना था क्या ? आकर बता दूँ तुम्हें ?

(चार)
अब जन्मदिन, साल में एक दिन,
आ के मुझको डराने लगे हैं,

अठखेलियाँ छोड़, गम्भीरता ओढ़,
मुझको चिढ़ाने लगे हैं,

शुरू कीजिये जाप, सुनिये अजी आप,
अब तो बुढ़ाने लगे हैं ….

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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Comments 7

  1. रविकर says:
    14 years ago

    बहुत बढ़िया —
    चमत्कारिक ||

    (१)
    अच्छे, बड़े सच्चे |
    दु:शासन के —
    उड़ेंगे परखच्चे —
    मरेंगे, धृत-राष्ट्र के बच्चे ||
    (२)
    अच्छी तरह से —
    ये – घोसले |
    कुनमुनाते चूजों को–
    पोस लें ||
    (३)
    गर इजाजत डौगी
    इक बार छू के देखूं–
    – – – – – – – – – – – –
    दो बार छू के देखूं —
    सौ बार – – – – – – –
    (४)
    फिर भी मरने का डर |
    धीरे -धीरे कम हो गया है |
    इससे बस थोडा सा आगे
    मेरा गम हो गया है ||

    Reply
  2. डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति says:
    14 years ago

    बहुत ही गंभीर रचनाएं … सादर

    Reply
  3. ABHIJEET GOSWAMI says:
    14 years ago

    allahabad ki peskas………
    lagi hame bahut mast………..
    ispar hame nahi koi sakh………….

    grt going bhaiya……….. 🙂

    Reply
  4. Unknown says:
    14 years ago

    किससे कहुँ
    कैसे कहुँ
    कहना तो चाहता हुँ
    पर कोई मिलता क्यों नहीं
    यूँ शब्द क्यो नही मिल रहे मुझे
    शायद स्वप्न देख रहा हुँ मैं
    नही ‍ये स्वप्न नही
    ये तो प्रभाव है
    इन कविताओं का जो
    अनुपम है

    Reply
  5. shephali says:
    14 years ago

    neeraj ji ko ek ache dost ki tarah se bat pehle se jaanti hun
    usnke is pehlu ke baare me pata to tha par itne gehre bhav hain ye ni jaanti thi

    neeraj ji aapke margdarshan ki hamesha jarurat hai

    एक बात पूछूँ ?…..

    तुम हो क्या वहाँ ? बढ़ कर छू लूँ तुम्हें ?
    नाराज हो ? आकर मना लूँ तुम्हें ?
    याद करती हो मुझे, कभी पलकें बन्द करके ?
    कुछ कहना था क्या ? आकर बता दूँ तुम्हें ?

    bahut achi likhi hai 🙂 meri post par aapke ek comment yaad aa gaya "har insaan ko ek baar pyar jarur karna chahiye, yar insaan ko bahut acha bana deta hai"

    🙂

    Reply
  6. Niraj says:
    14 years ago

    This comment has been removed by the author.

    Reply
  7. Niraj says:
    14 years ago

    रविकर जी, डॉ. नूतन, अभिजीत, माही और शेफाली आप सभी को धन्यवाद ।
    रविकर जी, आपकी कविता भी कम चमत्कारिक नहीं है । इसे मेरी कविताओं की टिप्पणी में जोड़ने के लिये शुक्रिया ।
    शेफाली खुद एक बहुत अच्छी मित्र, एक लेखिका और अच्छी इन्सान हैं । इनके शब्द अक्सर विभोर किये रहते हैं: http://wordsbymeforme.blogspot.com/

    पर सभी के साथ उस सज्जन को विशेष धन्यवाद जिसने इन कविताओं को अपने ब्लॉग पर स्थान दिया 🙂 त्रिपाठी जी, अभी बहुत सी हिचकियाँ आपको असमय परेशान करेंगी !

    Reply

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अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

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