मंदिर की घंटियों की आवाज के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है
किसी समय के बवडर में
खो गए
किसी बिसरे साथी के
जैसे दो अदृश्य हाथ
उठ आते हैं हार गए क्षणों में
हर रात सपने में
मृत्यु का एक मिथक जब टूटता है
और पत्नी के झुराए होंठो से छनकर
हर सुबह
जीवन में जीवन आता है पुनः जैसे
कई उदास दिनों के
फांके क्षणों के बाद
बासन की खड़खड़ाहट के साथ
जैसे अंतड़ी की घाटियों में
अन्न की सोंधी भाप आती है
जैसे लंबे इंतजार के बाद
सुरक्षित घर पहुँचा देने का
मधुर संगीत लिए
प्लेटफॉर्म पर पैसेंजर आती है
वैसे ही आऊँगा मैं…..
ललन चतुर्वेदी के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘आवाज घर’ से सात कविताएँ
ललन चतुर्वेदी की कविताओं की सहजता एवं संवेदनशीलता तो आकर्षित करती ही है, उन कविताओं के विषय भी कम मानीखेज नहीं है। ललन जी अपनी...





